पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवता पर आई विपदा के निवारण के लिए मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। कार्तिकेय और गणेश भी वहीं बैठे थे। समस्या सुनकर शिवजी ने कार्तिकेय व गणेश से पूछा- तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। शिव ने कहा- तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा, वही देवताओं की मदद करने जाएगा। यह सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परंतु गणेशजी सोच में पड़ गए कि वह मंद गति ले दौडऩे वाले अपने वाहन चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। उन्होंने उपाय लगाया। वे अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करने वापस बैठ गए। जब परिक्रमा से लौटे कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिवजी ने श्री गणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा। तब गणेश ने कहा- माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं। यह सुनकर भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अघ्र्य देगा, उनके तीनों ताप दूर होंगे। तभी से गणेशजी भक्तों के कष्टों को दूर करते आ रहे हैं।