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गोवर्धन पूजा प्रकृति संरक्षण का देती है संदेश

- रामद्वारा में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में हुई गोवर्धन पूजा और लगे छप्पन भोग

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गोवर्धन पूजा प्रकृति संरक्षण का देती है संदेश

गोवर्धन पूजा प्रकृति संरक्षण का देती है संदेश

ग्वालियर. रूढिय़ों में जकड़ा समाज उन्नति नहीं कर सकता है, क्योंकि कई मान्यताएं समय के साथ अप्रासंगिक हो जाती हैं एवं परिवर्तन ही विकास का मूल है। यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने गिरिराज पर्वत उंगली पर धारण कर गोवर्धन पूजा के माध्यम से समाज को जड़ता छोडक़र प्रकृति को पूजकर, पर्यावरण की रक्षा के साथ प्रक्रति से जुडऩे का संदेश दिया था क्योंकि प्रकृति एवं पर्यावरण की रक्षा होगी तभी मानव के स्वास्थ्य की रक्षा होगी। उक्त विचार अंतराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के संत रामप्रसाद महाराज ने लक्ष्मीगंज स्थित रामद्वारा में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान महायज्ञ में पांचवें दिन मंगलवार को गोवर्धन पूजा का प्रसंग सुनाते हुए व्यक्त किये। उन्होंने आगे कहा कि श्रीमद्भागवत में गोवर्धन पूजा का प्रसंग यह सिद्ध करता है कि हिंदू धर्म एवं शास्त्र कितने वैज्ञानिक हैं जिनमें प्रकृति के महत्व को भगवान की तरह पूजनीय बताया गया है। जो पहाड़, नदियां, झील, सरोवर, जंगल, हिमनद, कूप, बावडिय़ां हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। प्राणी जगत को उनका आभार मानकर ईश्वर के समान पूजना चाहिए।


कोरोना काल में समझे ऑक्सीजन का महत्व
संत रामप्रसाद ने आगे कहा कि कोरोना काल में हमें ऑक्सीजन का महत्व समझा आया। हरियाली कम होने से ऑक्सीजन की कमी हो रही है, प्रदूषण के कारण मनुष्य को सांस लेना भी मुश्किल हो रहा है। स्वस्थ जीवन जीने के लिए आवश्यक है कि हम प्राकृतिक संसाधनों को सहेज कर पौधरोपण करे, जल का अपव्यय रोकें, संरक्षण करें। प्राकृतिक संसाधनों पर किसी बलशाली-बाहुबली का एकाधिकार न होकर सभी प्राणियों का समान रूप से अधिकार होता है।

पद एवं सत्ता का अहंकार नहीं करना चाहिए
संत रामप्रसाद ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना के जल को जहरीला करने वाले उस पर कब्जा कर गोकुलवासियों को परेशान करने वाले कालिया नाग का मर्दन कर समाज को दिया जो आज भी प्रासंगिक है। किसी को भी पद एवं सत्ता का अहंकार नहीं करना चाहिए, कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उंगली पर धारण कर इंद्र के अहंकार का मर्दन किया। रामद्वारा में गोवर्धन पूजा की गई एवं भगवान गोवर्धन को छप्पन भोग अर्पित किए गए।