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 B Day:  ग्वालियर में बोले थे अटल क्या मेरी मौत के बाद बनेगा हिंदी भवन

मेरी कविता जंग का ऐलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं …ये आत्म विश्वास का जयघोष है ग्वालियर. अटल जी की ये कविता उनके जीवनगाथा का जीवंत सार है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व को गढऩे में ग्वालियर की मिट्टी का अहम योगदान है। जन्म से लेकर तरुणाई तक का वक्त उन्होंने ग्वालियर में बिताया। […]

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Shyamendra Parihar

Dec 25, 2015


मेरी कविता जंग का ऐलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं ...ये आत्म विश्वास का जयघोष है
ग्वालियर. अटल जी की ये कविता उनके जीवनगाथा का जीवंत सार है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व को गढऩे में ग्वालियर की मिट्टी का अहम योगदान है। जन्म से लेकर तरुणाई तक का वक्त उन्होंने ग्वालियर में बिताया। यहीं उनके व्यक्तित्व की नींव पड़ी।


कवित्त
कवि ह्दय अटलजी को वंशानुगत मिला। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत के मुख्य कवि थे। उनकी ईश प्रार्थना रियासत के सभी स्कूलों में गाई जाती थी। हिन्दी के प्रति पिता का अनुराग उनकी पूजा बन गया।



ग्वालियर में रहते हुए सबसे पहले उन्होंने ताजमहल कविता रची। इसके बाद जीवन भर उनका कविता से कभी नाता नहीं टूटा। सूनामी से जब सारा देश घबराया हुआ था, तब उन्होंने ग्वालियर में ही हुए एक निजी कार्यक्रम में जोशपूर्ण कविताएं सुनाईं।


भाषा:
2003 में ग्वालियर यात्रा के दौरान लोगों से पूछ ही लिया कि क्या मेरी मौत के बाद हिन्दी भवन बनेगा? लोग हैरत में रह गए। संयुक्त राष्ट्र संघ हो या कोई और अवसर, उनका हिन्दी अनुराग छूटा नहीं। ये प्रेरणा उन्हें ग्वालियर से ही मिली। यूं कहें उनके घर से। शिवमंगल सिंह सुमन जैसे मनीषी कवि उनके पिता के प्रिय विद्यार्थी रहे।

वक्तृत्व
भारतीय राजनीति में अटलजी दुर्लभतम राजनेता रहे, जिनका भाषण सुनने कोसों दूर से लोग आया करते थे। चाहे वह संसद हो या कोई चुनावी सभा, उनके शब्द और शैली लोगों के दिलों तक पहुंचती थी। इसकी ट्रेनिंग भी उन्हें गोरखी स्कूल में ही मिल गई थी। कक्षा पांच में जब वे यहां पढ़ते थे, तब एक प्रतियोगिता में उन्हें भाषण देना था। उन्हें कई बार टोका गया। वे माने नहीं पूरा भाषण रटा लेकिन उसी शैली में सुनाया, जिसमें वह सुनाना चाहते थे। ग्वालियर से ही वाद-विवाद की राष्ट्रीय स्पर्धाएं जीतीं।


समर्पण
सिद्धांत और विचार और दल के प्रति उनके समर्पण का गुण उनके जीवन में ग्वालियर में ही रचा बसा। स्कूली जीवन में ही वे आर्यकुमार सभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए। अपने मित्रों में खानवलकर ने उनके बड़े भाई की भूमिका निभाई। बाद में यही संघ के शाखा प्रचारक नारायण ने उन्हें अकाट्य सिद्धांतवादी बना दिया।


उदारता
उदारता उनके जीवन में रची बसी थी। वे बचपन से ही बेहद संवदेनशील थे। इसके संस्कार भी उन्हें शहर और परिवार से ही मिले। उनके करीबी मित्रों के अनुसार, उनकी सबसे पहली रचना ताजमहल रही। नाम से लगता है कि वह कोई शृंगार प्रधान कविता होगी, लेकिन वह उन मजदूरों,महिलाओं बच्चों के प्रति समर्पित कविता थी, जिनका इससे बनाने में शोषण हुआ था।