
ग्वालियर। बिलौआ, रफादपुर, लखनपुरा, सूखा पठा, मऊ-जमाहर, बेरजा, पारसेन, जखौदा, जखारा आदि जगहों पर राजनीतिक और प्रशासनिक मिलीभगत से माइनिंग गिरोह सक्रिय है। सरकारी नियमों का फायदा उठाकर यह गिरोह जियोलॉजिकल सर्वे की जानकारी रखने वालों से पत्थर के स्थान चिह्नित करा रहा है और फिर डमी नामों से ५ हजार का चालान जमा कराकर लीज और फिर ३ साल बगैर काम किए अर्थदंड जमा करके लीज कराकर पत्थर निकालने का अधिकार ले रहा है।
स्थिति यह है कि अभी तक स्वीकृत हुए १६८ खदानों में से ८१ खदान असल पट्टा धारक नहीं चला रहे हैं। सिर्फ ४७ खदानों पर ही वास्तविक क्रैशर लगे हैं, इनमें से भी क्रैशर संचालकों के नाम पर सिर्फ ५ खदान हैं। हर साल लगभग २ हजार करोड़ रुपए का काला कारोबार कर रहे पत्थर माफिया ने खदानों से प्रति वर्ष लगभग ७५२ लाख घनमीटर पत्थर निकालकर बाजार में बेचा और सरकार के खजाने में हर साल अधिकतम १२१ करोड़ आए हैं।
इतनी राशि में मिल रही खदान
रसूखदार माफिया जगह के हिसाब से ५० लाख से १ करोड़ तक देकर ०.०५ हैक्टेयर की खदान को बिना पट्टा कराए खरीदा जा रहा है। २ से ५ हैक्टेयर की खदानों को खरीदने ९ से १२ करोड़ रुपए की रकम खर्च करके माइनिंग माफिया अपना कब्जा जमा रहा है।
खनिज माफिया अपने फायदे के लिए डमी नाम से लीज करा रहा है, इस पूरे काम में माइनिंग पॉलिसी को ही हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस तरह होती है सरकारी मदद
अंतरण का आवेदन तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। खदान सरेंडर होते ही विभागीय कर्मचारी आवेदनकर्ता को जानकारी दी जाती है।
खदान में पत्थर का गणित लगाया जाता है। पसंद आने पर पट्टा सरेंडर करने वाले से ऑब्जेक्शन न लगाने की स्वीकृति लेकर सौदा तय।एक तरीका यह है खदान पट्टा धारक का आवेदन लगने के साथ ही क्रैशर संचालक सौदा कर लेते हैं। अगर वह रसूखदार है तो क्रैशर संचालक पार्टनर बना लेते हैं।अन्यथा निश्चित रकम देकर अंतरण करा लेते हैं।
बोल्डर बेचकर हो रही अवैध कमाई
माइनिंग एक्ट के अनुसार लीज लेने के बाद पट्टा धारक को खदान पर क्रैशर लगाना अनिवार्य है। इस नियम को दरकिनार कर पट्टा धारकों द्वारा १५० रुपए प्रति टन के हिसाब से कच्चा बोल्डर बेचा जा रहा है।
यह करते हैं माइनिंग के खिलाड़ी
पट्टा लेने वाला व्यक्ति लीज के बाद तीन साल तक संचालन नहीं करता है, इसके बाद आर्थिक अभाव का हवाला देकर शपथपत्र के साथ शासन को काम करने मेंं असमर्थतता व्यक्त करता है। माइनिंग पॉलिसी के हिसाब से विभाग शपथ पत्र पर सहमति को आधार बनाकर किसी दूसरे संचालक के आवेदन अंतरण के लिए स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद खदान को वैध तरीके से अंतरित कर दिया जाता है।किसी दूसरे की खदान को खरीदने के लिए क्रैशर माफिया से जुड़े लोगों को पैनल्टी सहित लगभग १ लाख २० हजार रुपए का शुल्क तीन साल बंद रही खदान के बदले में जमा करना पड़ता है। कब्जा कर रहे बड़े खदान मालिक प्रतीक खंडेलवाल ने अभिलाष भार्गव से खदान का अंतरण कराया है। इसके साथ ही स्तुति स्टोन क्रैशर के साथ पार्टनरशिप करके सिर्फ 0.5 हैक्टेयर में लगाकर करोड़ों का व्यापार किया जा रहा है।
नोट:- इनके सहित अन्य क्रैशर संचालक और अंतरित खदानों की सूची सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद है, पत्रिका के पास सभी खदानों की सूची मौजूद है।
Published on:
05 Feb 2018 02:36 pm
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