Jhansi Ki Rani: मई 1842 में हुआ था रानी लक्ष्मीबाई का विवाह, ऐसा था शादी का कार्ड

jhansi ki rani: रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य और पराक्रम के लिए हर साल समाधि पर लगता है मेला...।

By: Manish Gite

Published: 18 Jun 2021, 09:55 AM IST

ग्वालियर। प्रसिद्ध कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की वो कविता आज भी कई लोगों के कानों में गूंजती है। 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।' रानी लक्ष्मी बाई के पराक्रम पर लिखी यह कविता स्कूलों में भी पढ़ाई जाती है। 18 जून को लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर में देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। इसी दिन बलिदान दिवस (balidan diwas) के रूप में आयोजन कर रानी को देशभर में याद किया जाता है। आज ग्वालियर में बलिदान मेला आयोजित किया गया है...।

 

patrika.com पर प्रस्तुत है रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर उनसे जुड़ी कुछ स्मृतियां...।

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18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस है। रानी (jhansi ki rani) को वीरता, शौर्य और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने के लिए हमेशा जाना जाता है। हर साल ग्वालियर में आयोजित विभिन्न आयोजनों में उनसे जुड़ी कुछ स्मृतियां प्रस्तुत की जाती हैं। सरकार के पास कुछ दस्तावेज हैं, जो उनके बारे में जिज्ञासा पैदा करते हैं। उनमें से एक है लक्ष्मी बाई का शादी का कार्ड, जो अपने आप में बेहद दुर्लभ है।

 

 

 

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ऐसा था रानी की शादी का कार्ड

काशी के एक मराठी ब्राह्मण परिवार में 19 नवंबर 1828 को लक्ष्मी ने जन्म लिया था। उनका नाम मणिकर्निका (manikarnika) रखा गया था। सभी लोग प्यार से मनु कहने लगे थे। जब वे 14 साल की थी तभी झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवालकर से मई 1842 में उनका विवाह हुआ था। शादी की तैयारियां हुई। शादी के लिए आमंत्रण पत्र भी तैयार किया गया था। उस विवाह पत्रिका में शादी का शुभ-मुहूर्त भी लिखा गया था। यह आज भी सुरक्षित है। लक्ष्मीबाई के शस्त्र आज भी सरकार के पास रखे हुए हैं। उनसे जुड़ी यादें हर साल बलिदान मेले में रखे जाते हैं। यह दर्शकों के लिए रखे जाते हैं।

 

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छबीली बुलाते थे पेशवा

लक्ष्मी के पिता बिट्ठूर के पेशवा आफिस में काम करते थे और लक्ष्मी अपने पिता के साथ पेशवा के यहां जाती थी। पेशवा भी लक्ष्मी को अपनी बेटी जैसा ही मानते थे। बहुत सुंदर दिखने वाली यह लड़की बहुत ही चंचल थी। पेशवा उसे छबीली कहकर पुकारने लगे थे।

 

18 साल में बन गई थी शासक

लक्ष्मीबाई 18 साल की कम उम्र में ही झांसी की शासिका बन गई थी। उनके हाथों में झांसी का साम्राज्य आ गया था। ब्रिटिश आर्मी के एक कैप्टन ह्यूरोज ने लक्ष्मी के साहस को देख उन्हें सुंदर और चतुर महिला कहा था। यह वही कैप्टन था जिसकी तलवार से लक्ष्मी ने अपने प्राण त्यागे थे। इतिहास के पन्नों में यह भी मिलता है कि ह्यूरोज ने इसके बाद रानी को सेल्यूट भी किया था।

बलिदान मेले में यह है खास

लक्ष्मीबाई (Laxmibai) के सम्मान में हर साल ग्वालियर (Gwalior) में होने वाला वीरांगना बलिदान मेला गुरुवार से शुरू हो गया। लक्ष्मीबाई की समाधि पर रानी की शहादत की 163वीं वर्षगांठ पर मेले का आयोजन कोविड गाइडलाइन के तहत किया जा रहा है। झांसी के किले से आई शहीद ज्योति को समाधि स्थल पर स्थापित किया गया। पूरे शहर के 51 चौक-चौराहों पर शहीदों के नाम के दीपक जलाए गए। पड़ाव चौराहे पर मेला के संस्थापक पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया, सांसद विवेक शेजवलकर सहित अनेक लोगों ने 'शहीद ज्योति' की अगवानी की।

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रौशनी ने जगमगाया समाधि स्थल

बलिदान दिवस की पूर्व संध्या पर पूरे ग्वालियर शहर के 51 चौक-चौराहों पर दीप जलाए गए थे। राष्ट्रगीत गायन हुआ। इस मौके पर जयभान सिंह पवैया ने कहा कि शहीद ज्योति आज रानी लक्ष्मीबाई की 1857 की क्रांति की याद दिला रही हैं।

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गृहमंत्री ने किया याद

मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्र (narottam mishra) ने रानी झांसी के बलिदान दिवस पर उन्हें याद किया। उन्होंने अपने ट्वीट संदेश में कहा कि "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।" अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाली,शौर्य व बलिदान की प्रतिमूर्ति झांसी की #रानी_लक्ष्मीबाई जी की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन। आपके संघर्ष,अमर बलिदान के लिए देश सदैव आपका ऋणी रहेगा।

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