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काकोरी कांड: ग्वालियर से खरीदी बंदूकों के दम पर हुई थी अंग्रेजों के सरकारी खजाने की लूट,चंबल के बीहड़ों में छिपे थे पं. बिस्मिल

12 साल पहले ही लोगों को पता चला बिस्मिल का परिवार था चंबल निवासी

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सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजू ए कातिल में है। यह शेर भले ही पटना के शायर बिस्मिल ने लिखा हो लेकिन यह सटीक बैठता है स्वतंत्रता संग्राम के काकोरी कांड को अंजाम वाले आजादी के महानायक पं.रामप्रसाद बिस्मिल पर। काकोरी कांड को अंजाम देने के लिए न केवल उन्होंने ग्वालियर से हथियार खरीदे बल्कि फरारी के दौरान उन्होंने चम्बल क्षेत्र में शरण भी ली। पं.बिस्मिल का जन्म चंबल में तो नहीं हुआ था लेकिन उनका चंबल अंचल के मुरैना जिले से विशेष जुड़ाव रहा है।
मां की सलाह पर पहुंचे पिनाहट के जंगलों में
लाहौर षड्यंत्र के बाद जब पं. रामप्रसाद बिस्मिल पर दबाव ज्यादा बढ़ा तो वे छिपने के लिए सुरक्षित जगह की तलाश कर रहे थे। उनकी मां मूलमति ने सलाह दी कि चंबल का बरवाई तुम्हारा पैतृक गांव और चंबल पार कर पिनाहट में ननिहाल हैं वहां अज्ञातवास आसानी से कट जाएगा। पं. बिस्मिल ने बरवाई और पिनाहट के जंगलों में अपना अज्ञातवास काटकर आजादी के आंदोलन को जीवित रखा।
शाहजहांपुर में हुआ था जन्म
बिस्मिल के दादा नारायण सिंह तोमर मुरैना की पोरसा तहसील के ग्राम बरवाई में ही जन्मे और पले-बढ़े भी लेकिन पारिवारिक कारणो बिस्मिल के दादा अपने दो बेटों मुरलीधर (पं.रामप्रसाद बिस्मिल के पिता) व कल्याणमल के साथ पलायन कर उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में बस गए और पांडित्य कार्य से गुजर-बसर करने लगे। बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को हुआ था। बचपन से मां के आज्ञाकारी बेटे होने के साथ वे क्रांतिकारी विचारों से जुड़े और 1916 में लाहौर षड्यंत्र के बाद सक्रिय रूप से आजादी के आंदोलन से जुड़ गए। लाहौर षड्यंत्र में क्रांतिकारी परमानंद को फांसी होने के बाद बिस्मिल ने इसका बदला लेने की प्रतिज्ञा ली। यहीं से उनका स्वदेश प्रेम और क्रांतिकारी जीवन शुरू हुआ।
जुटाने लगे हथियार
क्रांतिकारी गतिविधियों को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए पं. बिस्मिल ने ग्वालियर आकर एक पिस्तौल खरीदी, कुछ दिनों बाद दो पिस्तौल और एक कटार भी खरीदी। इस प्रकार क्रांतिकारी दल का पुनर्गठन किया। अन्य स्थानों से भी हथियार व कारतूस खरीदे । ग्वालियर से खरीदे हथियारों की दम पर ही काकौरी कांड को अंजाम दिया। पुलिस के भारी दबाव के कारण दल के बिखर जाने पर अपने पैतृक गांव बरवाई और ननिहाल के पास पिनाहट में अज्ञातवास काटते हुए दल का पुनर्गठन किया।
इसलिए अंजाम दिया गया काकोरी कांड
क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे स्वतन्त्रता के आन्दोलन को गति देने के लिए धन आवश्यकता थी। शाहजहांपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनाई। इसके बाद 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन" को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, चन्द्रशेखर आज़ाद व 6 अन्य सहयोगियों की सहायता से समूची लौह पथ गामिनी पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया। इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्तौल भी काम में लिए गए थे। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को परिणाम दिया था।
बिस्मिल सहित 6 क्रांतिकारियों को हुई थी फांसी
इस घटना से हिली अंग्रेजी सरकार ने उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व यात्रियों की हत्या करने का मुकदमा चलाया। जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।
स्थानीय लोगों कम ही थी जानकारी
वर्ष 2010 के पहले बहुत कम लोग जानते थे कि पं. रामप्रसाद बिस्मिल का पैतृक गांव चंबल का बरवाई और वे पंडित नहीं क्षत्रिय थे। कुछ गिने-चुने लोग उनके नाम पर कार्यक्रम आयोजित करते थे। वर्ष 2009 में मुरैना से सांसद चुने जाने के बाद केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पुराने संग्रहालय को तुड़वाकर नवनिर्माण कराया और उसका नामकरण अमर शहीद पं. रामप्रसाद बिस्मिल के नाम पर कराया था।