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नि:स्वार्थ प्रेम का प्रतीक थी कृष्ण-सुदामा की मित्रता

- कथा के अंतिम दिवस माहेश्वरी भवन में कृष्ण-सुदामा के मिलन का प्रसंग देख भावुक हो गए श्रद्धालु

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नि:स्वार्थ प्रेम का प्रतीक थी कृष्ण-सुदामा की मित्रता

नि:स्वार्थ प्रेम का प्रतीक थी कृष्ण-सुदामा की मित्रता

ग्वालियर. माहेश्वरी भवन मेें चल रही श्रीमद्भागवत कथा के विश्राम दिवस मंगलवार की कथा में कृष्ण-सुदामा के मिलन के प्रसंग का सजीव चित्रण देख श्रद्धालु भावुक हो गए। कृष्ण-रुकमणि के दर्शन और सुदामा से चावल लेने के लिए भक्तों में होड़ मच गई। राम उपाध्याय ने सुदामा के किरदार का बहुत ही सुंदर चित्रण किया। इससे पूर्व अंतिम दिन की कथावाचक वैंकटेश प्रपन्नाचार्य महाराज ने कहा कि जैसे-जैसे मनुष्य का स्वभाव बदलता है, वैसे-वैसे उसका प्रभाव भी बदलने लगता है। उन्होंने कहा कि धन की संपन्नता से किसी व्यक्ति का आंकलन न करें। धन व्यक्ति को मापने का पैमाना नहीं होना चाहिए। व्यक्ति को अपने कार्य की स्वत: समीक्षा करते रहना चाहिए, क्योंकि व्यक्ति जब स्वयं को खुद की अदालत में खड़ा करता है तो वह अपना सही आंकलन कर पाता है।

दान करो तो बताओ मत, पाप करो तो छिपाओ मत
प्रपन्नाचार्य महाराज ने कहा कि दान का गान मत करो, अन्यथा सारा पुण्य क्षीण हो जाएगा पाप बता दो लेकिन दान की चर्चा किसी से मत करो। दान करो तो किसी को बताओ मत और पाप करो तो छिपाओ मत। किसी ब्राह्मण का तिरस्कार मत करो, ऐसा करने से संपूर्ण कुल का नाश हो जाता है। जो दान लेकर छीन ले या कहने के बाद भी न दें, उसे जन्म जन्मांतर इसका दु:ख भोगना पड़ता है। सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि श्रीकृष्ण व सुदामा की मित्रता नि:स्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा थी, जो आज भी उदाहरण के रूप में जानी जाती है। हम बिना स्वार्थ के मित्र नहीं बनाते, लेकिन सुदामा ने बिना किसी कामना के द्वारिकाधीश को अपना मित्र बनाया। उन्होंने बताया कि सुदामा को द्वारपालों ने रोका नहीं था, वे तो इजाजत लेकर कृष्ण के महल में गए थे, क्योंकि श्रेष्ठ लोगों से मिलने से पहले इजाजत जरूर लेनी चाहिए।

मन से विकारों को फिल्टर कर देती है कथा
बड़े भाग्य से मानव जीवन मिला है, इसे आनंद से जिओ। परनिंदा में अपनी उर्जा का क्षय मत करो। कथा सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं हैं। ये अज्ञानता से प्रकाश की ओर ले जाती है। जीवन में व्यस्त रहते हुए भी भगवान की स्तुति मत छोड़ो। जीवन में तमाम बुराई और समस्याएं हैं, इसके बाद भी जीवन बुरा नहीं हैं। अभाव की शिकायत करके हम दु:खी होते हैं, लेकिन कथा वह है जिससे जीवन के विकार स्वत: ही निकल जाते हैं। संसार से मुक्ति का मार्ग सिर्फ श्रीहरि की शरण है। पूजा पाठ तो हम सिर्फ अपने पापों को छिपाने के लिए करते हैं। लोग आपसे सहानभूति कर सकते हैं, लेकिन आपके दर्द नहीं ले सकते हैं। इस मौके पर राम किशोर सिंगी, ललित बियानी, प्रदीप जाजू, राजेश सोमानी, जितेंद्र जाजू, कृष्ण कुमार सारडा, प्रियांशु गोयल, अशोक नागोरी, कमल बागड़ आदि ने भागवत कथा की आरती उतारी।