
ग्वालियर। चैत्र नवरात्र में पहाड़ाय वाली माता के नई सड़क स्थित मंदिर पर श्रद्धालुओं की खासी भीड़ लगती है। राजस्थान के डीडवाना से आई पहाड़ाय वाली माता की सेवा के लिए हर साल वहीं से अलग-अलग पुजारी यहां आते हैं। इस संबंध में इस साल सेवा करने आए पंडित विनोद शर्मा ने बताया कि माता का ये रूप डीडवाना से ही आया है। हमारे परिवार में 7 भाई हैं जो बारी-बारी से यहां सेवा करते हैं।
चैत्र नवरात्र के पहले दिन से ये सेवा शुरू होती है, जो साल भर चलती है। डीडवाना में पहाड़ाय वाली माता का मुख्य मंदिर है। इसके साथ ही इनका एक ओर रूप डीडवाना से 6 किलोमीटर दूर भी हैं जिन्हें सरकी माता के नाम से जाना जाता है। उन्होंने आगे बताया कि पहाड़ाय वाली माता से मनोकामना करने वाले हर श्रद्धालु को झोली जरूर भरती है।
नवरात्र में विशेष शृंगार और भोग
चैत्र नवरात्र में माता के विशेष शृंगार और भोग लगते हैं। इसके साथ ही आखरी दिन भंडारे का आयोजन होता है। इस वर्ष भी 27 मार्च को कन्या भोज के बाद शाम को 6 बजे से इसका आयोजन होगा।
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महल से मां के दर्शन
नवरात्र शुरू होने के पहले दिन सिंधिया राजवंश की ओर से मांढरे वाली माता के पूजन का सामान जयविलास पैलेस से आता है। चैत्र नवरात्र की अष्टमी को सिंधिया परिवार का कोई एक सदस्य मां का पूजन करने के लिए स्वयं उपस्थित होता है। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मांढरे वाली माता सिंधिया परिवार की कुल देवी हैं। माता को मुढि़या पहाड़ पर इस ऊंचाई पर स्थापित किया गया था कि सिंधिया परिवार के सदस्य महल से मां के दर्शन दूरबीन से आसानी से कर सकें। मंदिर के व्यवस्थापक यशवंत राव मांढरे बताते हैं कि मेरे पूर्वज आनंद राव मांढरे, सिंधिया स्टेट में कर्नल थे। वे मां दुर्गा के अनंत भक्त थे। तात्कालीन महाराज जीवाजी राव सिंधिया ने मेरे पूर्वज को उन क्षेत्रों की कर वसूली का जिम्मा दिया था, जिन क्षेत्रों से कर वसूली नहीं हो पाती थी।
इस दौरान उन्हें कई जगह युद्ध करना पड़ा। युद्ध मार-काट के दौरान कई बार दुर्गा भवानी का उन्हें साक्षात्कार हुआ। इसके बाद उन्होंने सब कुछ छोड़कर मां की पूजा-अर्चना शुरू कर दी। यहां अष्टभुजाधारी काली दुर्गा की स्थापना की। इस देवी को तात्कालीन महाराज ने मांढरे की माता के नाम से पुकारना शुरू किया और अपनी कुलदेवी के तौर पर पूजना शुरू कर दिया था।
इस मंदिर की स्थापना संवत १९३० में की गई थी। मां का यह स्वरूप काली का है। मां का शृंगार उसी तरह किया जाता है, जिस तरह योद्धा रणभूमि में जाता है। मां को नौ गज की साड़ी (सोलह हाथ) पहनाई जाती है। मां का यह स्वरूप रण क्षेत्र में युद्ध के दौरान का है। मां को सोने का मुकुट, चांदी की पायल आदि से शृंगार किया जाता है। यहां मां के पट सुबह ब्रह्म मुहूर्त में खुल जाते हैं और २ बजे तक श्रद्धालुओं को दर्शन मिलते हैं। इन दिनों मां सिर्फ दो घंटे ही विश्राम करती हैं।
Published on:
23 Mar 2018 01:26 pm
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