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गणेश चतुर्थी : यहां स्वयं प्रकट हुए थे भगवान श्रीगणेश, 500 वर्ष पहले हुआ था ये चमत्कार

आज शुक्रवार से भगवान श्री गणेश जी 11 दिनों के लिए मेहमान बनकर आएंगे। शहर में कई विशाल पंडाल लगाए गए हैं। 

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ग्वालियर। आज शुक्रवार से भगवान श्री गणेश जी ११ दिनों के लिए मेहमान बनकर आएंगे। शहर में कई विशाल पंडाल लगाए गए हैं। साथ ही घरों में भी श्रीजी को विराजने के लिए तैयारियां जोरो पर हैं।

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देश भर में गणेश चतुर्थी पर मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी-भरकम भीड़ उमड़ी रही है। गणेश भारत के अति प्राचीन देवता हैं। ऋग्वेद में गणपति शब्द आया है। यजुर्वेद में भी ये उल्लेख है। अनेक पुराणों में गणेश की विरूदावली वर्णित है। पौराणिक हिन्दू धर्म में शिव परिवार के देवता के रूप में गणेश का महत्वपूर्ण स्थान है।

300 साल पहले यहां प्रकट हुए थे मोटे गणेश
शहर के खासगी बाजार में गणेश जी का ये मंदिर 500 साल पुराना है। बताया जाता है कि यहां ये प्रतिमा इस स्थान पर स्वयं प्रकट हुई है। प्रतिमा काफी बड़ी और मोटी है इसलिए भगवान गणेश का ये रूप मोटे गणेश कहलाता है। यहां स्थापित गणेश प्रतिमा राजस्थान के मेवाड़ रियासत से लाई गई थी। तत्पश्चात इसका जीर्णोद्धार जीवाजीराव सिंधिया द्वारा करवाया गया।

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अर्जी वाले रिद्धि-सिद्धि गणेश मंदिर

150 वर्ष पुराना से बना - पहले ये मंदिर काफी छोटा था, इसमें प्रवेश करने की भी जगह नहीं थी। यहां सेवा करने वाले ललित खंडेलवाल को श्रीजी ने दर्शन देकर इसे संवारनेे के लिए कहा, तब जयपुर से आए कारीगरों ने मंदिर में कांच का काम किया।

सिद्धि विनायक मोटे गणेश का मंदिर

500 वर्ष पहले पानीपत के राजा बाजीराव पेशवा को लेखराज महाराज ने इस मंदिर को बनाने प्रेरणा दी थी। जिसे सरदार विंचूरकर द्वारा बनवाया गया।

1978 से मन रहा गणेशोत्सव शहर में गणेशोत्सव मनाने की परंपरा की शुरूआत मुरार में 1978 से की गई थी। उस समय छह स्थानों पर गणेश जी स्थापित किए जाते थे। इसके बाद हमारी ?सोसिएशन ने इस परंपरा को महाराज बाड़े पर 1982 से शुरू किया जो अभी तक लगातार जारी है। यह कहना है लाइट डेकोरेशन एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अशोक शर्मा तूफान का। उन्होंने बताया कि पांच दिन तक होने वाले इस आयोजन में रोजाना ही विद्युत सजावट बदलते थे। सबसे अच्छी सजावट करने वाले को पुरस्कार भी दिया जाता था।