
MP News: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक अहम फैसला सुनाया है। जिसमें कोर्ट की ओर से कहा गया कि एक बच्चे की पहचान अधूरी नहीं हो सकती। उसकी पहचान में माता और पिता, दोनों का नाम शामिल होना उसका कानूनी अधिकार और गरिमा का हिस्सा है। पति-पत्नी के आपसी विवाद का खामियाजा बच्चे को उसकी पहचान खोकर नहीं भुगतना चाहिए। यह अहम फैसला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की युगल पीठ ने पिता का नाम स्कूल रिकॉर्ड से हटाने के मामले में दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राथमिक शिक्षा के दौरान स्कूल रिकॉर्ड में जैविक पिता का नाम दर्ज करना न केवल कानूनी रूप से आवश्यक है, बल्कि यह बच्चे के भविष्य के लिए अनिवार्य दस्तावेज है।
याचिकाकर्ता विक्रम एच. कलमाडी एक नाबालिग बालक के जैविक पिता है। बालक पहले बेंगलुरु में पढ़ रहा था, जहां रिकॉर्ड में पिता का नाम दर्ज था। वैवाहिक विवाद के बाद मां बच्चे को लेकर ग्वालियर आ गई और यहां के एक निजी स्कूल में कक्षा-2 में उसका दाखिला कराया, लेकिन रिकॉर्ड से पिता का नाम गायब कर दिया। जबकि पिता नियमित रूप से स्कूल की फीस भर रहे थे और कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेशानुसार उन्हें बच्चे से मिलने का अधिकार भी था। ग्वालियर के स्कूल ने जिला शिक्षा अधिकारी के निर्देशों के बावजूद रिकॉर्ड में सुधार नहीं किया, जिसके खिलाफ पिता ने हाईकोर्ट की शरण ली।
जस्टिस की युगल पीठ ने एकल पीठ के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि स्कूल रिकॉर्ड केवल शैक्षणिक कागज नहीं हैं। यही रिकॉर्ड आगे चलकर आधार कार्ड, पासपोर्ट और बैंक खाते जैसे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों का आधार बनते हैं। यदि यहां पिता का नाम गायब रहा, तो बच्चे को भविष्य में कदम-कदम पर पहचान का संकट झेलना पड़ेगा। कोर्ट ने साफ किया कि भले ही स्कूल निजी या गैर-अनुदानित हो।
लेकिन यदि वह शिक्षा का अधिकार अधिनियम के दायरे में आता है, तो वह सार्वजनिक कर्तव्य से बंधा है। स्कूल अपनी मर्जी से पिता का नाम नहीं हटा सकता। आरटीई एक्ट के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों का सही और संपूर्ण रिकॉर्ड रखना स्कूल का कानूनी दायित्व है।
Published on:
06 Jan 2026 08:04 pm
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