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प्रदेश में यहां भी खप रहा है ग्वालियर-मुरैना का मिलावटी मावा !

खाद्य विभाग की टीम केवल त्योहार करती हैं सैंपलिंग,शहर में 160 रुपए प्रति किलो में धड़ल्ले से बिक रहा मावा
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प्रदेश में यहां भी खप रहा है ग्वालियर-मुरैना का मिलावटी मावा !

ग्वालियर। पिछले दिनों भिंड जिले में एसटीएफ की कार्रवाई में पकड़े गए सिंथेटिक मावे के बाद फिर से मिलावटी मावे को लेकर बहस छिड़ गई है। बावजूद इसके श्योपुर में खाद्य विभाग की ऐसी बड़ी कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। जबकि श्योपुर में भी ग्वालियर-मुरैना से आना वाला मावा धड़ल्ले से बाजार में खप रहा है। शहर की किसी भी दूध डेयरी पर ग्वालियर के मावे के नाम से 160 रुपए प्रति किलो में ये मावा सहज रूप में मिल जाएगा। हालांकि फूड सेफ्टी ऑफिसर श्योपुर में किसी प्रकार के सिंथेटिक मावे के होने से साफ इंकार करते हैं, लेकिन जब यहां ग्वालियर-मुरैना से मावा आ रहा है तो उसकी शुद्धता की गारंटी क्या है। विशेष बात यह है कि खाद्य सुरक्षा के अफसर भी श्योपुर में नियमित मावे की सैपलिंग करने के बजाय केवल वार-त्योहार पर ही सैंपल उठाते हैं।

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ऐसे में शहर में मिलावटी मावा बिकने के बाद भी कार्रवाई के नाम पर स्थिति शून्य नजर आती है। चूंकि अब त्योहारी सीजन शुरू हो गया है, लिहाजा मावे की खपत भी बढऩा तय है। बावजूद इसके खाद्य सुरक्षा के अफसर गंभीर नजर नहीं आते हैं। एक डेयरी संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि श्योपुर में स्थानीय बने मावे की खपत कम है, जबकि ग्वालियर और मुरैना से आने वाला मावा ज्यादा बेचा जाता है। ग्वलियर से 100 से 120 रुपए प्रति किलो में डेयरी संचालक ये मावा मंगाते हैं और श्येापुर में 16 0 रुपए प्रति किलो के भाव में बेच रहे हैं। जबकि डेयरी संचालक स्थानीय हलवाइयों द्वारा बनाए जाने वाले मावे को 300 रुपए प्रति किलो में बेचते हैं।

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होली की थी सैंपलिंग, जिसमें मिला सबस्टैंडर्ड
बताया गया है कि शहर में स्थानीय स्तर पर बनाए जाने वाले मावे में भी अन्य पदार्थों की मिलावट की खबरें पूर्व में आई भी हैं। शहर में खाद्य सुरक्षा की टीम ने अंतिम बार गत होली के त्योहार पर मावे की सैंपलिंग की थी, जिसमें ये सैंपल फैल हुआ और मावा सबस्टैंडर्ड(अवमानक) निकला था। बावजूद इसके अफसरों ने बाजार में पुन: सैंपलिंग के लिए मुडक़र नहीं देखा। बताया जाता है कि शहर में मावा बनाने वाले कुछ लोग दूध की क्रीम निकालने के बाद सप्रेटा दूध को गरम कर उसमें वनस्पति तेल मिला देते हैं, जिससे वह गाढ़ा हो जाता है। उसके बाद चमक के लिए रिफाइंड मिलाया जाता है। मावे को चार से पाच दिन तक सुरक्षित रखने के लिए उसमें शकर भी मिलाते हैं ताकि टेस्ट करने पर रिफाइंड या डालडा का असर नहीं दिखे।

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यूं भी कर सकते हैं मावे की पहचान

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हम करते हैं सैंपलिंग
खाद्य सुरक्षा अधिकारी गिरीश राजौरिया ने बताया कि भिंड में एसटीएम की टीम ने जैसा सिंथेटिक मावा पकड़ा, वैसा शहर में नहीं है। फिर भी हम नियमित रूप से मावे की सैंपलिंग करते हैं। गत होली पर हमने मावे के सैंपल लिए थे, जिसमें एक सैंपल सबस्टैंडर्ड आया था।

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