
ग्वालियर। आपने प्यार के किस्से बहुत सुने होंगे मगर राजा मान और मृगनयनी सा प्यार का किस्सा पहले कभी सुना होगा और ना ही देखा होगा। ये शहर इन एक राजा और जंगलों में रहने वाली ग्वालिन के प्रेम का गवाह है। राजा मानसिंह तोमर की आज जयंती है। इस खास अवसर पर हम आपको तोमर वंश के इस राजा के अनसुने किस्से सुनाने जा रहे हैं।
पहली नजर में ग्वालिन निन्नी को दिल दे बैठे थे राजा
राजा मानसिंह तोमर और निन्नी(मृगनयनी) की प्रेम कहानी अपने आप में अनोखी है। प्यार की ये अमर कहानी आज भी लोगों के लिए एक उदाहरण है कि प्रेम में कोई राजा और रंक नहीं होता। महाराज मानसिंत तोमर ने जंगलों में रहने वाली निन्नी को पहली बार जंगलों में देखा था। बेहद खूबसूरत होने के साथ साथ निन्नी शस्त्र विद्या में निपुण थी और बुद्धि में भी तेज थी। जंगलों में रहने वाली निन्नी को पहली नजर में देखते ही राजा ने उसे पटरानी बनाने का मन बना लिया था।
मृगनयनी को बनाना चाहते थे पटरानी
पहली बार देखने के बाद राजा मानसिंह तोमर ने तुरंत ही मृगनयनी को अपनी पटरानी बनाने का निश्चय कर लिया। उनके इस निश्चय का काफी विरोध भी हुआ लेकिन उन्होंने उससे इन सबको दरकिनार कर विवाह किया। राजा ने अपनी नई रानी के लिए एक भव्य महल भी बनवाया। मृगनयनी के गुज्जर जानि होने के कारण लोगों ने विरोध किया जिस पर इस महल को ग्वालियर किले के बाहर बनाया गया।
आज भी उस अमर प्रेम का अहसास कराता है गूजरी महल
ऐसे पड़ा नाम गूजरी महल ग्वालियर में स्थित गूजरी महल भारत के प्रसिद्ध पुरातात्विक संग्रहालयों में से एक है। यह इमारत वास्तविक रूप से एक महल थी जिसका निर्माण राजा मान सिंह ने अपनी पत्नी मृगनयनी के लिए करवाया था जो एक गूजर थी। अत इस महल का नाम गूजरी महल पड़ा। वर्ष 1922 में पुरातात्विक विभाग द्वारा इसे एक संग्रहालय में बदल दिया गया। यहां देखने को मिलेंगी दुलर्भ कलाकृतियां इस संग्रहालय में 28 गैलरियां और 9000 कलाकृतियाँ हैं। यहां 1 ली शताब्दी के समय की कलाकृतियाँ भी हैं। इसके अलावा यहाँ मूल्यवान पत्थर, रत्न, टेराकोटा की वस्तुएं, हथियार, मूर्तियां, पेंटिंग्स, शिलालेख, मिट्टी के बर्तन आदि का प्रदर्शन भी किया गया है।
बेशकीमती मूर्तियां और धरोहरों का घर है गूजरी महल
गूजरी महल संग्रहालय की मूर्तियों में प्रसिद्ध शालाभंजिक यक्षी, त्रिमूर्ति नटराज अर्धनारीश्वर और यमराज शामिल हैं। यहां शहर के मधु और धार क्षेत्र के फोटोग्राफ भी हैं जो 75 वर्ष पुराने हैं। यहाँ 15 वीं शताब्दी के महान संगीतकार तानसेन के जीवन से संबंधित प्रमाण भी हैं। किसी भी भारतीय इतिहासकार या इतिहास प्रेमी को इस संग्रहालय की सैर अवश्य करनी चाहिए। ऐसे पहुंचे फोर्ट तक लाल बलुए पत्थर से बना यह किला शहर की हर दिशा से दिखाई देता है। एक ऊंचे पठार पर बने इस किले तक पहुंचने के लिये दो रास्ते हैं। एक ग्वालियर गेट कहलाता है एवं इस रास्ते सिर्फ पैदल चढा जा सकता है। गाडियां ऊरवाई गेट नामक रास्ते से चढ सकती हैं और यहां एक बेहद ऊंची चढाई वाली पतली सड़क से होकर जाना होता है।
Published on:
19 Aug 2017 12:42 pm
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