अफसरों का कहना है कि जिले में जीवनस्तर सुधारने और आजीविका बढ़ाने के इस कार्यक्रम की शुरूआत हुए करीब 10 साल का समय हो गया है, वर्ष 2005 में एमपीआरएलपी से शुरू होकर एनआरएलएम तक के लंबे समय में समूहों के घरों में ही शौचालय न बनना प्रशासनिक असफलता दर्शाता है, क्योंकि जब हम अपनों से जुड़े लोगों के यहां पर ही शौचालय नहीं बनवा सकेंगे, तब दूसरों को कैसे इसके लिए प्रोत्साहित कर सकेंगे।इसलिए अब बिना किसी देरी के सभी सदस्य दिए गए लक्ष्य को पूर्ण करने में जुट जाएं, एक माह बाद फिर समीक्षा की जाएगी।