
कफन का कपड़ा नहीं कलेजा सा कटता है... ऐसे नहीं बनना अमीर
ग्वालियर. आमतौर पर किसी भी दुकानदार का यही उद्धेश्य रहता है कि उसके यहां अधिक से अधिक ग्राहक आएं और सामान की अधिक से अधिक बिक्री हो। कोरोना संक्रमण काल में लगातार हो रही मौतों से अंतिम संस्कार का सामान बेचने वालों के यहां खरीदारों की संख्या में खासा इजाफा हो गया है। यही कारण है कि इन दुकानों पर बिकने वाला कफन का सफेद कपड़ा भी अधिक कटने लगा है। पर कफन का कपड़ा बेचने वालों का कहना है कि इस कमाई से हमें अमीर नहीं बनना है। ऐसी आमदनी हमें नहीं चाहिए। वैसे तो अंतिम संस्कार का सामान बेचने वालों की दुकानें शहर में कम ही हैं। महाराज बाड़ा स्थित 90 वर्ष पुरानी मदनलाल खंडेलवाल कफन वालों की दुकान पर काम करने वाले पवन ने रूंआसे स्वर होते हुए कहा कि ये बात बिल्कुल सही है कि आम दिनों की अपेक्षा इन दिनों कफन का कपड़ा अधिक कटने लगा है। मन तो नहीं करता है कि कफन का यह कपड़ा काटें, पर फिर भी करना पड़ता है। हर दिन ईश्वर से यही कामना करता हूं कि अब इस कोरोना के कहर से शहर को बचाइए। किलागेट स्थित दुकान के संचालक मदन बाथम ने बताया कि 70 साल से यही काम कर रहे हैं पर मौत का ऐसा तांडव कभी देखने को नहीं मिला। कफन के कपड़े को काटते हुए कई बार मन अंदर से रोने लगता है।
एक शव....5 मीटर कफन
पवन ने बताया कि एक शव के लिए पांच मीटर कफन लगता है। पहले जहां पांच मीटर की जगह 15 मीटर कपड़ा काटना पड़ता था, पर इन दिनों हर रोज 75 से 100 मीटर कपड़ा काट रहे हैं। जब भी ये कपड़ा काटता हूं, अंदर से दिन रोने लगता है।
मुक्तिधाम में लकडिय़ां और कंडों का अंबार
शहर के लक्ष्मीगंज, मुरार और चार शहर का नाका स्थित मुक्तिधामों में इन दिनों बड़ी मात्रा में लकडिय़ां और कंडों का अंबार लगा देखा जा सकता है। चार शहर का नाका मुक्तिधाम जीर्णोद्धार एवं संवर्धन न्यास के अध्यक्ष डॉ.हरिशचंद्र पिपरिया ने बताया कि पहले एक दिन में 3 से 5 शव यहां आते थे, पर कोरोना काल में रोजाना करीब 20 पार्थिव देह आ रही हैं। उन्होंने बताया कि एक देह में करीब डेढ़ से दो क्विंटल लकड़ी और एक हजार कंडे लग जाते हैं।
Published on:
17 May 2021 03:19 pm
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