
सोशल इमोशनल लर्निंग सबसे जरूरी, बच्चों के लिए इफेक्टिव
ग्वालियर.
पिछली सदी से वर्तमान तक बहुत कुछ माहौल बदला है। पहले इंटेलीजेंट कोशंट को अधिक महत्वता दी जाती थी अब इमोशनल कोशंट की आवश्यकता बढ़ गई है। इमोशनल कोशंट सभी में होता है। अब जरूरी हो गया है कि एक-दूसरे को समझकर कैसे महसूस करें, किस तरह इंटरेक्ट करें, सीखें, जानें व इमोशन्स को समझकर रिएक्ट करें। खासकर इस पेंडेमिक में एजुकेशन को इनोवेटिव और बेहतर माध्यम से देना चुनौती बन गया है। इसके लिए अब सोशल इमोशनल लर्निंग सबसे जरूरी हो गई है। जिसमें पांच चीजे प्रमुख रूप से काम करती हैं जो हैं, सेल्फ अवेयरनेस, सोशल अवेयरनेस, मोटिवेशन, एमपथी, सोशल स्किल्स। ये पांच जब मिलते हैं तब सोशल इमोशनल लर्निंग बनती है, जो बहुत इफेक्टिव है। इस सोशल इमोशनल लर्निंग ने दूसरों के इमोशन समझने के लिए एक सेंस डवलप किया है। 21 वीं सदी की एजुकेशन के मद्देनचर इसकी मदद से हम एजुकेशन को ज्यादा फंक्शनल बना सकते हैं। आज की शिक्षा भविष्य में बेहतर समाज भी देखना चाहती है और ये तब होगा जब तक हम सब एक-दूसरे के लिए महसूस करें और एक-दूसरे तक अपनी पहुंच बनाएं। आज के एजुकेशन सिनेरियो को देखते हुए कुछ ऐसे ही जरूरी बदलाव पर एलेट्स 19जी वल्र्ड एजुकेशन सम्मिट-2021- स्कूल एजुकेशन के पैनल डिस्कशन में विचार व्यक्त कर रहे थे आइटीएम ग्लोबल स्कूल के प्रिंसिपल डॉ सुजाश भट्टाचार्य। यह डिस्कशन रिडिफाइनिंग द लीडरशिप इन द वर्चुअल एन्वॉयर्नमेंट-बिल्डिंग ए फ्यूचर-रेडी लर्निंग पेराडाइम टॉपिक पर हुआ। इसमें देशभर से प्रमुख एजुकेटर्स ने भाग लिया।
सेल्फ अवेयरनेस, सोशल अवेयरनेस, सेल्फ मैनेजमेंट
कार्यक्रम में इनोवेशन्स, लीडरशिप, और वर्चुअल लर्निंग पर चर्चा हुई, जिसमें ग्वालियर के आईटीएम ग्लोबल स्कूल को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया। इस पैनल डिस्कशन में डॉ सुजाश ने डवलपिंग, फ्रेमवर्क फॉर सोशल इमोशनल लर्निंग पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने इसकी शुरुआत इसके इतिहास से की। किस तरह डेनियल गोलमैन के 1995 के पब्लिकेशन ने इस आइडिया को डवलप किया। सोशल इमोशनल लर्निंग पांच आवश्यक क्षेत्रों को विकसित करता है, जिनमें सेल्फ अवेयरनेस, सोशल अवेयरनेस, सेल्फ मैनेजमेंट, रिलेशनशिप स्किल्स, रिस्पांसिबिल डिसीजन मेकिंग शामिल हैं। इससे इक्वल अंडरस्टैंडिंग व टेनिंग स्किल भी डवलप होती हैं। जो भी वीकनेस हैं, उन पर भी साथ काम करने का अवसर मिलता है। इससे वीकनेस को स्टेंथ में बदल सकते हैं। जो बहुत बेहतर रिजल्ट देते है। यह सिर्फ टीचर्स ही नहीं बल्कि स्टूडेंट्स को भी लाभ देता है। वे सीखते हैं कि डिसीजन कैसे लिए जाते हैं। छोटी-छोटी सी एक्टिविटी लाइफ डिफरेंट बनाती है। इस पैनल डिस्कशन में प्रमुख एजुकेटर्स प्रो मनीषा कवाथकर, संजय दत्ता, कविता हेगड़े, डॉ सीमा नेगी शामिल रहे।
पेंडेमिक ने सिखाया एडॉप्ट करना, विज्डम का हुआ विस्तार
आइटीएम के डॉ सुजाश भट्टाचार्य ने कहा कि जब हम 21 सदी के एजुकेशन के लैंडस्केप पर चर्चा कर रहे हैं, तो वह आज की परिस्थितियों के मुताबिक होना चाहिए। इस पेंडेमिक ने सब कुछ बदल दिया है अब हमें एडॉप्ट करना सीखना है। अब क्रिटिकल थिंकिंग एबिलिटी, रिस्क टेकर और कोलब्रेशन पर वर्क करना जरूरी है। ये सभी स्किल्स महत्वपूर्ण बन गई हैं। जिसके साथ इमोशनल कोशंट बहुत जरूरी है। पेंडेमिक से टेक्नोलॉजी सभी के लिए खुल गई हैं। हम नए लोगों से नए आइडियाज पर कम्युनिकेट कर पा रहे हैं। क्लासरूम की परिभाषा पूरी तरह बदल गई। कई वर्चुअल प्लेटफार्म आ गए हैं, जो स्टूडेंट्स को हर तरह से तैयार कर रहे हैं जैसे वे फिजिकली क्लास में उपस्थित रहकर एजुकेशन प्राप्त करते थे। उन्हें ई लाइब्रेरी, ई लैब, ऑडियो विजुअल इनपुट सभी उपलब्ध करवाया है। इस पेंडेमिक ने भले ही हमें क्वारेनटाइन कर दिया हो लेकिन विज्डम का विस्तार हुआ है, जो बदलाव के लिए बेहतर है।
Published on:
12 Jul 2021 10:04 am
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