
ग्वालियर. सुर सम्राट तानसेन के आंगन में भारतीय और विदेशी कलाकारों ने अपने सुरों की मिठास से सभी को अभिभूत कर दिया। जिम्बाम्बे से आए कलासाधकों ने जहां अपने वाद्ययंत्रों से मीठी-मीठी धुनें निकाली और अपनी प्रस्तुति के माध्यम से श्रोताओं को जोड़ा तो हर एक हाथ उनके इस्तकबाल के लिए उठे। वहीं भारतीय कलाकारों ने अपने गायन व वाद्ययंत्रों से रसिकों को भीतर तक प्रभावित किया। विश्व समागम अखिल भारतीय तानसेन समारोह के तीसरे दिन सुबह और शाम की सभा में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला।
पद्मभूषण सुल्ताना ने ताना सुरों का शामियाना
पद्मभूषण बेगम परवीन सुल्ताना ने गायन के लिए मधुर राग मारू बिहाग का चयन किया। इस राग में उन्होंने बड़ा ख्याल गाया जो कि एक ताल में निबद्ध था। जिसके बोल थे कैसे बिन साजन रहा न जाए। अपने गायन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने तीन ताल में छोटा ख्याल कवन न कीन्हों पेशकर रसिकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मध्य लय से उठे कल्याण थाट के मीठे राग मारू बिहाग को कुछ इस अंदाज में पेश किया कि पंचम लगते-लगते रसिक संगीत साम्राज्ञी के कायल हो गए। उन्होंने राग मिश्र पीलू में ठुमरी तुम राधे बनो श्याम गाकर पूर्व अंग की गायिकी का जादू बिखेर दिया।
अफ्रीकन कलाकरों ने तेज रिदम से भरा श्रोताओं में जोश
जिम्बाबे के ब्लेसिंग चिमंगा बैंड के कलाकारों ने सिंथेसाइजर, गिटार, सैक्सोफोन, ड्रम और मरीबा नामक वाद्य यंत्रों से अफ्रीकन धुनें निकालीं। उन्होंने अफ्रीका की सांस्कृतिक व मौलिक धुनों को तेज रिदम के साथ प्रस्तुत किया तो युवा रसिक श्रोताओं में जोश भर गया। बैंड के मुख्य कलाकार चिमांगा रहे, जो अलावा मारींबा नामक वाद्य यंत्र बजाते हैं। उनके साथ सिंथेसाइजर व मबीरा पर अलीशा, गिटार पर जोलास बास और तुलानी कुवानी ने सैक्सोफोन पर संगत की।
चंदबदनी मृगनयनी हंसगमनी पर बटोरीं तालियां
मुंबई से आए पं. सुखदेव चतुर्वेदी ने अल्प समय में तीन अलग-अलग रागों में बंदिशें पेश कर गागर में सागर भर दिया। उन्होंने तानसेन के सुपुत्र विलासखान द्वारा सृजित राग विलासखानी तोड़ी में एक बंदिश पेश की। ताल चौताल में निबद्ध बंदिश के बोल थे चंद बदनी मृग नयनी हंस गमनी। अपने गायन को विस्तार देकर राग देसी और धमार ताल में हूे तो तुम का गायन किया। उन्होंने राग शुद्ध सारंग और सूल ताल में हर हर महादेव बंदिश गाकर अपने गायन को विराम दिया।
का करूं सजनी आए न बालम
पुणे के शास्त्रीय गायक आनंद भाटे ने ठुमरी का करूं सजनी आए न बालम गाकर सुनाई तो पूरे माहौल में रंजकता छा गई। मूर्धन्य संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के शिष्य आनंद भाटे का खयाल गायन रसिकों को खूब भाया। उन्होंने राग वृंदावनी सारंग से गायन की शुरुआत की। इस राग में उन्होंने दो बंदिशें पेश कीं। झप ताल में निबद्ध विलंबित बंदिश के बोल थे तुम रब तुम साहिब तुम ही करतार। तीन ताल में पेश की गई द्रुत बंदिश के बोल थे जाऊं मैं तोपे बलिहारी। दोनों ही बंदिशों को उन्होंने घरानेदार अंदाज में पेश किया।
सरोद ने रसिकों को किया मंत्रमुग्ध
पुणे से आए युवा अभिषेक बोरकर ने मधुर राग चारुकेशी में परिचयात्मक अलाप के बाद तीन ताल में विलंबित व द्रुत गत बजाकर रसिकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस संवेदनशील सरोद वादक की प्रस्तुति में दाहिने और बाएं हाथ के बीच वांछित संतुलन से सुरों की वर्षा देखते व सुनते ही बन रही थी। सरोद वादन में उनके साथ तबले पर अंशुल प्रताप सिंह ने राग गावटी की।
वायलिन वादन सुन झूमे रसिक
भोपाल के प्रवीण शेवलीकर ने राग देसी में वायलिन वादन की शुरुआत की। इस राग में उन्होंने दो रचनाएं पेश की। विलंबित रचना एक ताल में और द्रुत रचना तीन ताल में निबद्ध थी। वादन का समापन राग भैरवी में दादरा की धुन निकालकर किया। उनके साथ तबले पर मिथिलेश झा ने संगत की।
मध्य और द्रुत लय में पेश कीं रचनाएं
सभा में बांसुरी का कमाल प्रख्यात बांसुरी वादक संतोष संत ने दिखाया। बांसुरी के लीजेंड पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के वरिष्ठ शिष्य संतोष संत अरसे बाद ग्वालियर आकर आप भाव विभोर थे। उन्होंने आलाप जोड़ झाला से शुरू करके आपने विलंबित रचना मत्तताल में पेश की, जबकि मध्यलय और द्रुत लय की रचनाएं तीन ताल में पेश कीं।
तबले से बजाईं पुरानी गतें त्रिपली
इंदौर के पंडित दिनेश शुक्ला ने एकल तबला वादन पेश किया। उन्होंने तीन ताल में प्रस्तुति दी। इसमें पेशकार से शुरू करके आपने कायदे, अजराड़ा और बनारस घराने के खास कायदे, कुछ पुरानी गतें त्रिपली आदि बजाई। तबले पर आपके साथ आप ही के शिष्य सारंग लासुरकर ने साथ दिया। सारंगी पर आबिद हुसैन ने एवम रचना पुराणिक ने हारमोनियम पर लहरा दिया।
राग चलनाट जोग से की शुरुआत
डागर वाणी के गायकों में शुमार डॉ राजेश शेंध ने राग चलनाट जोग में अपना गायन पेश किया। आलाप दु्रत आलाप से शुरु करके आपने दो रचनाएं पेश कीं। चौताल में निबद्ध पहली बंदिश के बोल थे नाद को न भेद पायो, जबकि दूसरी बंदिश सूलताल में थी बोल थे कैसो ज्ञान कैसो ध्यान। दोनो ही बंदिशों को आपने बड़ी सुघड़ता से गाया।
Published on:
22 Dec 2022 06:49 pm
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