
एमएलबी में प्रत्याशी मैदान में
ग्वालियर. प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव की वापसी के साथ छात्र राजनीति का वह दौर भी चर्चा में है, जब 35 साल पहले 1991 में हाईकोर्ट के स्टे ने चुनावी प्रक्रिया पर ब्रेक लगा दिया था। उस समय ग्वालियर के कॉलेजों, खासकर एमएलबी कॉलेज में चुनावी सरगर्मी चरम पर थी। अध्यक्ष पद के दावेदार मैदान में उतर चुके थे, छात्र संगठनों ने प्रचार शुरू कर दिया था और चुनाव को लेकर छात्रों में उत्साह था। इसी बीच जबलपुर हाईकोर्ट ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की चुनाव प्रक्रिया पर स्टे दे दिया। छात्र आंदोलन समिति के सदस्य और अध्यक्ष पद के दावेदार शिववीर सिंह भदौरिया, मानङ्क्षसह राजपूत और आशीष दुबे स्वयं जबलपुर पहुंचे और स्टे की प्रति लेकर तत्कालीन कलेक्टर बसंत सिंह को सौंपी। छात्र नेताओं का तर्क था कि हाईकोर्ट का स्टे केवल रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की चुनाव प्रक्रिया पर है, इसलिए ग्वालियर के कॉलेजों में चुनाव कराए जा सकते हैं। इसके बावजूद तत्कालीन सरकार ने कानून-व्यवस्था और पढ़ाई प्रभावित होने का हवाला देते हुए चुनाव कराने से इनकार कर दिया। छात्र नेताओं ने इसके पीछे राजनीतिक दबाव होने का भी आरोप लगाया था। चुनाव के साथ कई मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरे थे छात्र: उस दौर का छात्र आंदोलन सिर्फ चुनाव कराने तक सीमित नहीं था। छात्रों ने आयु सीमा संबंधी प्रतिबंध हटाने, नियमित छात्रसंघ चुनाव कराने, एमएलबी कॉलेज में महारानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा स्थापित करने और अलग लॉ कॉलेज खोलने जैसी मांगें भी उठाईं। इसके अलावा शिक्षा के निजीकरण पर रोक, शिक्षकों की ट्यूशनखोरी पर नियंत्रण, बेरोजगार छात्रों को भत्ता देने तथा खेल एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की मांग भी आंदोलन का हिस्सा थी।
एमएलबी में प्रत्याशी मैदान में, लेकिन चुनाव से पहले ही थम गई जंग
1991 में एमएलबी कॉलेज में अध्यक्ष पद के लिए शिववीर ङ्क्षसह भदौरिया, सतीश सिकरवार और संदीप चौहान प्रमुख दावेदारों में थे। चुनाव का माहौल बन चुका था। प्रत्याशी छात्रों के बीच पहुंच रहे थे और समर्थन जुटाने में लगे थे। लेकिन हाईकोर्ट के स्टे और सरकार के फैसले के बाद चुनाव नहीं हो सके। इससे छात्रों में नाराजगी बढ़ गई। छात्र आंदोलन समिति ने इसके विरोध में आंदोलन शुरू कर दिया। बाड़े पर धरना दिया गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय ङ्क्षसह को ज्ञापन भेजकर छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग की गई।
तीन साल बाद बदली चुनाव की व्यवस्था
1991 के घटनाक्रम के करीब तीन साल बाद छात्रसंघ चुनावों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया। प्रत्यक्ष चुनावों की जगह मेरिट आधारित प्रणाली लागू कर दी गई। इसके साथ छात्रसंघ चुनावों का वह स्वरूप बदल गया, जिसमें छात्र सीधे अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते थे। छात्र राजनीति के इतिहास में यह दौर महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। अब लंबे अंतराल के बाद प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव की वापसी से 1991 के उस दौर की यादें फिर ताजा हो गई हैं।
छात्रसंघ चुनाव नेतृत्व की सबसे बड़ी पाठशाला
छात्र आंदोलन समिति के संयोजक शिववीर ङ्क्षसह भदौरिया, जो 1991 में अध्यक्ष पद के दावेदार थे, कहते हैं कि छात्रसंघ चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि युवाओं में नेतृत्व क्षमता, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करने की सबसे बड़ी पाठशाला हैं। उनके मुताबिक, छात्रसंघ चुनावों ने देश को कई ऐसे नेता दिए हैं, जिन्होंने आगे चलकर देश की बागडोर संभाली। यदि युवा राजनीति में आएंगे और नई नेतृत्व क्षमता विकसित होगी तो निश्चित रूप से बेहतर समाज का निर्माण होगा।
Updated on:
09 Aug 2026 05:52 pm
Published on:
09 Aug 2026 05:41 pm
