
ग्वालियर। प्रथम श्रेणी में बीएससी पास करने वाला प्रदीप जाटव गरीबी े के भंवर में ***** रहे परिवार की आशाओं का एकमात्र केंद्र था। मेहगांव के मुस्तरा गांव निवासी २४ वर्षीय प्रदीप जाटव ने दो माह पहले ही आइटीआइ डिप्लोमा भी लिया था। पूरे परिवार को बस नौकरी का इंतजार था। वहीं, मेहगांव में ही गल्लामंडी के पास रहने वाले १६ वर्षीय आकाश गर्ग की विधवा मां भी बेटे को अफसर बनाने का सपना संजोए हुए थी। दो अप्रैल को प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा ने दोनों परिवारों के सपने चकनाचूर कर दिए।
दलित होने की कीमत चुकाई
पत्रिका भिण्ड से ३० किमी दूर बसे प्रदीप के ग्राम मुस्तरा पहुंचा। वहां अभी भी मौत का मातम पसरा है। दुखी परिजन ने बताया कि प्रदीप तीन भाइयों में सबसे छोटा था। पिता रामनरेश जाटव व बड़े भाई देशराज जाटव व मिथुन जाटव मजदूरी करते हैं। दोनों बड़े भाई पढ़ नहीं पाए, लेकिन प्रदीप को शुरू से ही सिर्फ पढऩे से ही मतलब था। दो पीढिय़ों से गरीबी झेल रहे प्रदीप के ८० वर्षीय दादा प्रहलाद जाटव, ७८ वर्षीय दादी कैलाशी तक सबका एक ही सपना था नौकरी मिलते ही प्रदीप खुशियों की बारिश कर देगा।
परिजन बताते हैं, प्रदीप बेटे कभी किसी प्रदर्शन में शामिल नहीं हुआ। उसे अपनी पढ़ाई और नौकरी तलाशने से ही फुर्सत नहीं थी। हमने तो सिर्फ दलित होने की कीमत चुकाई है। प्रदीप २ अप्रैल को ग्वालियर के लिए निकला तो यही लगा कि शाम तक लौट आएगा, क्या पता था सपने चूर होने की खबर मिलेगी।
विधवा मां का बेटा भी चला गया
कृषि उपज मंडी के पास रहने वाली लोंगा देवी के आंसू थम ही नहीं पा रहे। सिसकते हुए उन्होंने बताया, २ अप्रैल की सुबह आकाश को सब्जी और किराना खरीदने के लिए बाजार भेजा था। मेरे बेटे को तो यह भी पता नहीं था कि प्रदर्शन क्यों किया जा रहा है और उसमें शामिल लोग कौन हैं। दस साल पहले पति को खो चुकीं लोंगा देवी आकाश की नाम सुनते ही बिलख पड़ती हैं।
जैसे-तैसे खुद को संभालकर उन्होंने बताया, २००८ में दिल का दौरा पडऩे से पति की मौत हो गई। बड़े बेटे विकास को सहकारिता विभाग में भृत्य पद पर नौकरी मिल गई थी, लेकिन छोटे बेटे आकाश को अच्छे स्कूल में पढ़ा रही थीं। सपना था कि उसे बड़ा अफसर बनाऊं। जिसके सहारे सब गम भूल गई थी, उसका चेहरा नजरों से हटता ही नहीं। पता नहीं अब कैसे जी पाऊंगी।
Published on:
06 Apr 2018 01:28 pm
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