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MP में कांग्रेस विधायक का चुनाव शून्य, हलफनामे में जानकारी छुपाना पड़ गया भारी

मध्यप्रदेश में चुनाव परिणाम को चुनौती देना कोई नई बात नहीं है, कई मामलों में अदालतों के फैसलों ने चुनावी नतीजों को बदल दिया है। आज मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने विजयपुर सीट के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए विधायक का चुनाव निरस्त कर पूर्व मंत्री रामनिवास रावत को विजयी घोषित किया है।

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MP High Court

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MP High Court: यह मामला तब शुरू हुआ था, जब रामनिवास रावत ने कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा के खिलाफ याचिका दायर की। इस याचिका में उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान दाखिल किए गए हलफनामे में आपराधिक मामलों की जानकारी पूरी तरह से नहीं बताई गई, कई जानकारियां छिपाई गईं। अदालत ने इस मामले पर सुनवाई की और कई गवाहों के बयान भी दर्ज किए। वहीं आज हाई कोर्ट के फैसले ने हर किसी को चौंका दिया। कोर्ट के इस फैसले पर जरूर पढ़ें पत्रिका की ये रिपोर्ट...

भारत में चुनाव याचिका से जुड़े नियम क्या कहते हैं? जानें 5 बड़े कानूनी कारण

भारतीय चुनाव कानून यानी Representation of the people Act, 1951 के तहत यदि चुनाव प्रक्रिया गंभीर गड़बड़ी साबित हो जाए तो अदालत चुनाव परिणाम बदल सकती है…

1- हलफनामे में गलत जानकारी
यदि उम्मीद्वार अपनी संपत्ति, आपराधिक मामलों या अन्य जरूरी जानकारी छिपाता है, तो अदालत इसे मतदाताओं को गुमराह करना मान सकती है। ऐसे मामलों में संबंधित विधायक का चुनाव जीरो किया जा सकता है, निरस्त किया जा सकता है।

2- सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग
यदि चुनाव प्रचार में सरकारी अधिकारी, सरकारी वाहन या संसाधनों का दुरुपयोग किया जाए, इनके इस्तेमाल को चुनावी भ्रष्ट आचरण माना जाए या साबित कर दिया जाए, तो ऐसे मामलों में कोर्ट चुनाव रद्द कर सकती है।

3- चुनावी रिश्वत या प्रलोभन का आरोप
यदि मतदाताओं को पैसे, सामान या अन्य लालच देकर वोट लेने का आरोप साबित हो जाए, तो अदालत चुनाव परिणाम को अवैध घोषित किया जा सकता है।

4- नामांकन प्रक्रिया में भारी गड़बड़ी
यदि किसी उम्मीद्वार का नामांकन गलत तरीके से स्वीकार या खारिज कर दिया जाए, तो अदालत चुनाव प्रक्रिया को ही अवैध मान सकती है।

5- वोटिंग या काउंटिंग में अनियमितता हो
यदि वोटों की गिनती में गड़बड़ी या चुनाव प्रक्रिया में गंभीर तकनीकी गलति या चुनाव प्रक्रिया में अनियमितता साबित हो जाए, तो भी कोर्ट चुनाव परिणाम बदल सकती है।

क्या है Election Petition

यानी चुनाव याचिका क्या है? दरअसल यह वह कानूनी प्रक्रिया है, जिसके जरिए कोई भी उम्मीद्वार चुनाव परिणाम को लेकर कोर्ट में चुनौती दे सकता है।

भारत में चुनाव याचिका पर फैसला 4-5 साल का रिकॉर्ड

भारत में चुनाव याचिकाओं पर सुनवाई अक्सर लंबी चलती हैं। लेकिन कुछ मामलो में अदालतों ने अपेक्षाकृत जल्द फैसले भी सुनाए हैं। लेकिन ये रिकॉर्ड कहीं 5 साल में निपटे तो कहीं सिर्फ 6 महीनों में फैसला सुना दिया गया।

पहले भी पलटे जा चुके हैं चुनाव परिणाम

1971 में रायबरेली चुनाव के मामले में कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ प्रयागराज (अलाहबाद हाईकोर्ट) में चुनाव याचिका लगाई गई। इस याचिका पर 4 साल तक सुनवाई के बाद फैसला आया। अदालत ने इस चुनाव को रद्द कर दिया। इस मामले में रायबरेली लोकसभा चुनाव में सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप लगा था। कोर्ट ने 12 जून 1975 को फैसला सुनाया। चुनाव परिणाम शून्य घोषित करने से प्रधानमंत्री की लोकसभा सदस्यता खत्म हो गई थी और देश की राजनीति पर बड़ा संकट आ गया था।

इन चुनावी याचिकाओं पर जल्दी फैसले की मुहर

हाल के वर्षों में हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका पर तेजी से सुनवाई करना शुरू किया। ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित न हो सके…कर्नाटक विधायक सुभाष कल्लूर का फैसला इसी का उदाहरण बना। 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने इनके फैसले में अपेक्षाकृत कम समय में ही फैसला सुनाया और चुनाव रद्द कर दिया। इस याचिका में सरकारी ठेके से जुड़े हितों के टकराव का मामला सामने आया था। कोर्ट के फैसले में चुनाव परिणामों को अवैध घोषित करने से विधायक की सदस्यता समाप्त हो गई और यह सीट खाली रह गई।

2012 केरल विधायक का चुनाव भी बदला

केरल में वर्कला काहर मामले में केरल हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दर्ज की गई। इसमें एक उम्मीद्वार का नामांकन गलत तरीके खारिज करने का आरोप लगा। हाईकोर्ट में चली सुनवाई के बाद फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने चुनाव परिणाम रद्द कर दिया।

क्या है सुप्रीम कोर्ट की राय

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ऐसा कई बार कह चुका है कि चुनाव याचिकाओं का जल्दी निपटारा होना जरूरी है। क्योंकि यह सीधे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा मामला है।

मध्य प्रदेश में कितनी चुनाव याचिका दायर कितनी पर आया फैसला

मध्य प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा चुनाव के बाद उम्मीद्वार चुनाव परिणाम को अदालत में चुनौती देते हैं। ये सभी मामले आमतौर पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव याचिका के रूप में दायर होते हैं।

भारत में चुनाव याचिकाओं के जरिए कई बार अदालतों ने चुनाव परिणाम बदले हैं। मध्यप्रदेश में भी ऐसे मामले सामने आए हैं, यहां जानें एमपी समेत भारत के कुछ चर्चित मामले…

2013 में बदनावर सीट के खिलाफ चुनाव याचिका दायर

मध्य प्रदेश की बदनावर विधानसभा सीट पर राजवर्धन सिंह दत्तीगांव पर चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताओं का मामला एमपी हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट में यह मामला लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में रहा। इसके कारण ये मामला चुनाव परिणाम को अदालत में चुनौती देने के कारण चर्चा में रहा।

संबंधित खबरें

2013 के विधानसभा चुनाव

एमपी के कई सीटों पर चुनाव याचिका दायर की गईं। इनमें से कुछ मामलों में कोर्ट ने सबूतों के अभाव के कारण याचिकाएं खारिज कर दीं।

2008 में विधानसभा चुनाव

करीब 8 विधायकों के चुनाव को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। इनमें तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहनी, मंत्री जयंत मलैया और पूर्व केंद्रीय मंत्री सरताज सिंह जैसे नेताओं के खिलाफ भी याचिकाएं दायर की गई थीं।

2023 विधानसभा चुनाव

कई सीटों पर चुनाव याचिकाएं दायर की गईं, हाईकोर्ट में चुनावपरिणामों को लेकर दर्ज इन याचिकाओं को भी सबूतों के अभाव में कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसका एक मामला शाजापुर सीट पर कांग्रेस नेता हुकुम सिंह कराडा़ का है। इन्होंने हार के बाद चुनाव याचिका दायर की थी।

2025 में कर्नाटक विधायक का चुनाव हुआ था निरस्त

केवाई नानजेगौड़ा का मामला चुनाव याचिका के माध्यम से कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा। उन पर बीजेपी उम्मीद्वार ने आरोप लगाया था कि वोटों की गिनती में गड़बड़ी हुई है। कई प्रक्रियाओं के नियमों का उल्लंघन भी किया गया। हाईकोर्ट ने विधायक का चुनाव निरस्त किया और दोबारा वोटों की गिनती के आदेश दिए। चुनाव परिणाम पर सवाल खड़ा हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि कुल मिलाकर कहा जा सकता है, कि एमपी में चुनाव याचिका का ये मामला नया नहीं है, यहां हर बार दर्जनों चुनाव याचिकाएं दायर की जाती हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम मामलों में चुनाव परिणाम बदले गए, ज्यादातर याचिकाएं सबूतों की कमी या तकनीकी कारणों से खारिज कर दी जाती हैं। या लंबी न्यायिक प्रक्रिया में उलझ जाती हैं। ऐसी कई विधानसभा चुनाव याचिकाओं में 4-5 साल तक फैसला आने तक विधान सभा का कार्यकाल ही समाप्त हो जाता है।

यहां जानें कितना लंबा होता है ये कानूनी रास्ता

  • चुनाव परिणाम घोषित करते हुए विजेता के नाम का ऐलान कर दिया जाता है
  • 45 दिन में याचिका हाईकोर्ट में दायर की जाती है।
  • हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान, गवाहों के बयान, दस्तावेजी सबूत पेश किए जाते हैं।
  • अदालत का फैसला आता है, जो चुनाव सही घोषित, चुनाव निरस्त या दूसरे उम्मीद्वार को विजयी घोषित करता है और जिसके खिलाफ याचिका दर्ज की जाती है, उसके चुनाव परिणाम को शून्य या रद्द करने की घोषणा कर सकता है।
  • इसके बाद हाईकोर्ट विधायक को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की छूट दे सकती है।

हलफनामे में जानकारी छिपाना क्यों पड़ता है भारी

चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीद्वार को नामांकन के समय एक शपथपत्र या हलफनामा देना होता है। इसमें उम्मीद्वार को अपनी पूरी जानकारी देनी होती है। इसमें उसे आपराधिक मामले यदि हों तो, संपत्ति और देनदारियां, शैक्षणिक योग्यता, आय के स्रोत और जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति के बारे में भी सबकुछ बताना होता है। भारतीय चुनाव आयोग इस जानकारी को मतदाता अधिकारों से जोड़ता है। सुप्रीमकोर्ट भी कई फैसलों में कह चुका है कि मतदाताओं को उम्मीद्वार के बारे में सबकुछ पता होना चाहिए।

जानकारी छिपाई तो क्या होगा?

-चुनाव परिणाम को अदालत में चुनौती दी जा सकती है

-कोर्ट चुनाव रद्द कर सकती है।

-उम्मीद्वार को अयोग्य घोषित कर सकती है

-इसी आधार पर कई मामलों में कोर्ट ने चुनाव परिणाम बदले हैं।

ये बड़े मामले जिनमें बदले परिणाम

-प्रयागराज हाईकोर्ट ने रायबरेली चुनाव में गड़बड़ी का दोषी मानते हुए इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी थी। 1975 में आए इस फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था।

-सुप्रीम कोर्ट ने राशिद मसूद के मामले में फैसले में दोष साबित होने के बाद सांसद के रूप में उनकी सदस्यता रद्द कर दी थी।

-उत्तरप्रदेश की रामपुर सीट पर उनकी विधायक सदस्यता अदालत का फैसला आने के बाद रद्द कर दी गई थी।

-जया बच्चन के 2006 में ऑफिस ञफ प्रॉफिट मामले में दोषी पाए जाने पर उनकी राज्यसभा सदस्यता को निरस्त कर दिया था।

-वहीं चारा घोटाले में सजा होने के बाद लालू प्रसाद यादव की सांसद सदस्यता खत्म कर दी गई थी।