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ग्वालियर : न प्लास्टिक, न शोर, बस सनातन परंपरा की ओर 22 को होगी वैदिक शादी, गोधूलि बेला में किया पूजन

आधुनिकता की अंधी दौड़, डीजे के कानफोड़ू शोर और प्लास्टिक कल्चर के इस दौर में तानसेन की नगरी ग्वालियर एक ऐसी अनोखी शादी की गवाह बनने जा रही है, जो समाज की आंखें खोलने के लिए काफी है।

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ग्वालियर. आधुनिकता की अंधी दौड़, डीजे के कानफोड़ू शोर और प्लास्टिक कल्चर के इस दौर में तानसेन की नगरी ग्वालियर एक ऐसी अनोखी शादी की गवाह बनने जा रही है, जो समाज की आंखें खोलने के लिए काफी है। आगामी 22 जून को डॉ. आर्षी वशिष्ठ और मनीष मिश्रा परिणय सूत्र में बंधेंगे। संस्कारों की छांव में होने वाली ये शादी पूरी तरह दहेज मुक्त होगी। इस विवाह की सबसे बड़ी खास बात यह है कि इसमें तामझाम संभालने के लिए कोई हाई-फाई इवेंट मैनेजर भी नहीं है।

गोधूलि बेला में गो माता का पूजन, दिया आशीर्वाद

इस पावन सफर की शुरुआत भी उतनी ही अलौकिक रही। शुक्रवार को लाल टिपारा स्थित आदर्श गोशाला में गोधूलि बेला के दिव्य समय पर विशेष गणेश पूजन के साथ गुरु-गौरी गो-पूजन किया गया। वधु पक्ष ने गो माता की आरती उतारी, उन्हें हरा चारा खिलाया और अपनी नई जिंदगी के लिए आशीर्वाद लिया।

जीरो प्लास्टिक वेडिंग : पत्तल पर होगा भोजन

दिखावे और वीआइपी कल्चर को दरकिनार कर इस शादी को पूरी तरह इको-फ्रेंडली रखा गया है। पूरे आयोजन से प्लास्टिक और डिस्पोजल को कट कर दिया गया है। मेहमानों को स्टील के बर्तनों और पारंपरिक पत्तलों पर शुद्ध खड़े मसालों से तैयार हाइजीनिक भोजन परोसा जाएगा। पं. चंद्रशेखर शर्मा और आचार्य चैतन्य त्रिवेदी सहित 5 प्रकांड ब्राह्मणों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्रकृति को साक्षी मानकर फेरे होंगे।

वैदिक रीति-रिवाज से कर रहे शादी

हमारी संस्कृति में गाय को गुरु की प्रबलता का प्रतीक माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार विवाह की सफलता के लिए लड़के का सूर्य बल और लड़की का गुरु बल बलवान होना जरूरी है और गुरु बल गो-सेवा से ही मजबूत होता है। प्राचीन काल की इस अनिवार्य परंपरा को पुनर्जीवित करने का यह हमारा एक छोटा सा प्रयास है। शादी को वैदिक रीति-रिवाज से संपन्न करा रहे हैं।

समिकेश वशिष्ठ (वधु के पिता)