
कभी साथ जीने-मरने की कसमें खाने वाले दंपत्ति अब अदालतों में आमने-सामने खड़े हैं। पहले तकरार, फिर अलगाव, फिर वर्षों की कानूनी जंग और अंत में एक मोटी रकम के साथ समझौता। शहर और अंचल में तलाक के मामलों की तस्वीर साफ बता रही है कि रिश्ते भावनाओं से नहीं, अब शर्तों और रकम से तय हो रहे हैं। कुटुंब न्यायालय और हाईकोर्ट में पहुंच रहे अधिकांश मामलों का अंत आपसी सहमति पर हो रहा है, लेकिन यह सहमति आसान नहीं। औसतन 15 से 20 लाख रुपए तक का एकमुश्त स्थायी भरण-पोषण देकर पति समझौते पर मुहर लगा रहे हैं। लंबी लड़ाई के बाद दोनों पक्ष थक जाते हैं। समय निकल जाता है, पैसा खर्च हो जाता है और मानसिक शांति बिखर जाती है। हाईकोर्ट से से हुए फैसलों में यही ट्रेंड दिख रहा है।
रिश्तों में दरारें बढ़ीं, इसलिए केस भी बढ़े
- वर्ष 2026 के पहले 45 दिनों में कुटुंब न्यायालय ग्वालियर में 376 नए मामले दर्ज हुए। इनमें 250 तलाक से जुड़े और 126 भरण-पोषण व घरेलू हिंसा से संबंधित हैं। बीते वर्ष की तुलना में इस वर्ष मामलों की संख्या अधिक है।
-यदि न्यायालय या काउंसलर दंपत्ति को साथ रहने या सहमति से तलाक के लिए तैयार भी कर लेते हैं, तो भी शर्तों पर लंबी बहस होती है। स्थायी भरण-पोषण तय करने में घंटों लग जाते हैं।
- हाईकोर्ट में ग्वालियर-चंबल संभाग के आठ जिले और विदिशा जिला शामिल हैं। इन जिलों के फैमिली कोर्ट के आदेशों के विरुद्ध अपील हाईकोर्ट में दायर होती है। सभी जिलों में लगभग समान प्रवृत्ति देखी जा रही है।
केस-1
दीपिका (परिवर्तित नाम) का पति से 10 वर्ष तक तलाक का मामला चला। हाईकोर्ट में दीपिका ने फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की। अंत में दोनों ने आपसी सहमति से समझौता किया। पति ने 15 लाख रुपए स्थायी भरण-पोषण दिया। 12 फरवरी को सहमति से तलाक की डिक्री पारित हुई।
केस-2
किशन (परिवर्तित नाम) का तलाक का मामला कुटुंब न्यायालय से खारिज हो गया था, क्योंकि वह क्रूरता साबित नहीं कर पाए। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की। दोनों पक्षों ने आठ वर्ष तक कानूनी लड़ाई लड़ी। अंततः 15 लाख रुपए स्थायी भरण-पोषण पर सहमति बनी और 12 फरवरी को तलाक की डिक्री जारी हुई।
45 दिन में प्रदेश के चार महानगरों में आए मामले
शहर | मामले
ग्वालियर | 376
भोपाल | 437
इंदौर | 628
जबलपुर | 378
(1 जनवरी से 15 फरवरी तक)
विशेषज्ञ की राय
जो दंपत्ति लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ चुके हैं, वे अंततः समझौते के तहत अलग हो रहे हैं। यदि एक पक्ष तलाक के लिए राजी नहीं होता, तो मामला वर्षों तक लंबित रहता है। ऐसे में स्थायी भरण-पोषण लेकर सहमति से तलाक लेना व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है।”
एच.के. शुक्ला, काउंसलर, हाईकोर्ट
Published on:
17 Feb 2026 11:05 am
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