
किसने दस्तक दी ये दिल पर कौन है, आप तो अंदर हैं बाहर कौन है...
आइटीएम यूनिवर्सिटी की अदबी पेशकश इस बार फि र अदब प्रेमियों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ गई। इबारत के इस ग्यारहवें अध्याय में उर्दू शायरी व हिंदी रचनाओं के मुख्तलिफ रंग देखने और सुनने को मिले। प्रेम, सद्भाव, निर्मल हास्य और भारतीयता के स्वरों में रंगी-रची शेरो सुखन की ये शाम अपने आपमें अदभुत थी। सबके चहेते प्रख्यात शायर डॉ राहत इंदौरी ने जब अपनी शायरी की तहें खोलीं, तो नाद एम्फ ीथिटर की शाम रोचक हो उठी। लगा कि जिंदगी, मोहब्बत उसके दर्द, उसकी खुमारी, बेबाकी और खास संवेदनाएं गजलों और नज्मों के लिबास में उतर आई हैं। जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा था, वैसे-वैसे शेरो-सुखन का जादू बढ़ता गया और ऑडियंस हर एक क्षण उस गहराई में डूबती गई। एटा से अज्म शाकिरी, लखनऊ से मनीष शुक्ला, गुना से असलम राशिद और ग्वालियर के मदनमोहन दानिश ने देर रात तक समां बांधा।
महफिल को परवान तक पहुंचाया राहत ने
इबारत की इस महफि ल को परवान पर पहुंचाया सबके महबूब शायर राहत इंदौरी ने। शायरी के बेबाकी अंदाज को उन्होंने जिस लहजें में सुनाया कि देर रात तक श्रोता उन्हें दाद देते नहीं थके। सबसे पहले उन्होने शेर पढ़ा, अपना आवारा सिर झुकाने को तेरी दहलीज देख लेता हूं, और फि र कुछ दिखाई दे या न दे, काम की चीज देख लेता हूं।
किसने दस्तक दी ये दिल पर कौन है आप तो अंदर है बाहर कौन है...। अगला शेर पढ़कर उन्होंने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा मेरी सांसो में समाया भी बहुत लगता है, और वही शख्स पराया भी बहुत लगता है, उससे मिलने की तमन्ना भी बहुत है, लेकिन आने जाने में किराया भी बहुत लगता है...।
दानिश ने किया इबारत का आगाज
इबारत का आगाज शहर के ही शायर मदनमोहन दानिश ने किया। उन्होंने अपने शेरो सुखन से सबकों तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने सुनाया हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं, मुहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं...। दूसरा शेर अर्ज किया आने वाले के लिए दुआ करता हूं मैं, मै हूं दरवाजा मोहब्बत का खुला रखता हूं मैं, जिंदगी में बेसबब कुछ भी कभी होता है क्या, कोई चेहरा है तभी तो आइना रहता हंू मैं...।
शेर और गजलों में दिखीं इश्क की रूहानियत
इसके बाद मेहमान शायरों मे सबसे पहले शेरो-शायरी पढ़ी असलम राशिद ने। सुनाया शजर से टूटकर पत्ता उदास रहने लगा, डरकर मां से ये बच्चा उदास रहने लगा, वो एक मोज जो दरिया से रोज लड़ती रहती थी, बिछड़कर गई वो दरिया उदास रहने लगा...। इबारत के सिलसिले को आगे बढ़ाया लखनऊ के मनीष शुक्ला ने, उन्होंने अपने शेर और गजलों से इश्क की रूहानियत को बयां किया किसी के इश्क में बर्बाद होना, हमें आया नहीं फ रहाद होना, कोई तामिर की सूरत तो निकले, हमें मंजूर है बुनियाद होना...।
शाकिरी ने जीता यंगस्टर्स का दिल
शेरो-सुखन के जलसे में अब बारी थी एटा से आए अज्म शकिरी की, जिन्होंने मोहब्बत के शेर तरन्नुम में सुनाए जरूरत से ज्यादा मिल गई है, मोहब्बत बेइरादा मिल गई है, मैं जीतना जिंदगी को चाहता था, मुझे उससे ज्यादा मिल गई है...। इसके बाद उन्होंने एक नज्म सुनाई। बिछड़ते वक्त उसकी आंख में इस बार आंसू क्यों नहीं आए, मैं समझा ही नहीं ये उसकी जानिब से, कहानी को यहीं खत्म करने का इशारा था।
इंसान को सत्य कहने का साहस देती है कविता
आईटीएम के संस्थापक कुलाधिपति रमाशंकर सिंह ने गांधी की विचार और कविता, भाषा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि गांधीजी ने 11 पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया। भारत की भाषा की विविधता विराट रही है। 200 सालों में कई भाषा और बोलियां विलुप्त हुई हैं। भाषा की मजबूती, सम्पन्नता और ताकत एडॉप्ट करने या अपनाने में है। कविता इंसान को सत्य कहने का साहस देती है। यही गांधी विचार का मूल तत्व था।
Published on:
21 Oct 2019 12:41 pm
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