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# WORLD AUTISM DAY:  LOVE THERAPY से बदल रही जिंदगी

पढ़ाई में कमजोरी, शब्दों को पहचानने में परेशानी लेकिन अपनों का प्यार और विश्वास और उसमें सीखने की ललक ने उसे दूसरे बच्चों से कही ज्यादा स्पेशल बना दिया।

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Gaurav Sen

Apr 02, 2016

#world autism day

#world autism day


ग्वालियर। तारे जमीं पर फिल्म देखी होगी जिसमें दर्शिल सफारी ने ऑटिज्म बच्चें का रोल निभाया था। पढ़ाई में कमजोरी, शब्दों को पहचानने में परेशानी लेकिन अपनों का प्यार और विश्वास और उसमें सीखने की ललक ने उसे दूसरे बच्चों से कही ज्यादा स्पेशल बना दिया।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आईस्टन को कंसंट्रेशन की दिक्कत थी। जिसके कारण उन्हे कई बार स्कूल से निकाला भी गया था। संगीतकार गैंस एमेडियूस मोजार्ट ऑटिज्म के शिकार थे लेकिन पांच साल की उम्र में ही उन्होंने संगीत को अपना दोस्त बनाया और क्रीबोर्ड और वायलीन पर जबस्दस्त पकड़ बनाई।


ऐसे कई महान व्यक्ति थे जो ऑटिज्म, सेलिब्रेल पॉल्सी, एस्पंजर सिंडोम को मात देकर अपने विलक्षण प्रतिभा को दुनिया से रुबरू करवाया। इस लोगों ने साबित कर दिया कि ऑटिज्म एक स्थिति से ज्यादा कुछ नहीं है और इससे पीडि़त होने के बाद भी अपने प्रतिभा के दम पर दुनिया में अपना नाम रोशन किया।

शहर में भी कई ऐसे लोग है जो इन गंभीर बीमारी से पीडि़त होने के बाद भी खुद को साबित किया है और आज इस बीमारी से उबर कर सफलता के नया आयाम लिख रहे है। कई स्पेशल चाइल्ड है जिसमें इस अवस्था को छोटा साबित करते हुए अपने जीवन को एक नई मंजिल तक पहुंचाया। 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म दिवस पर एक खास रिपोर्ट

एचीवमेंट

सोनाली घटक
सोनाली फिजिकली चाइलेंज्ड होने के कारण वह शुरु में कोई भी काम नहीं कर पाती थी। घर में अकेला छोडऩे में भी डर लगता था। वह खाना भी नहीं बना पाती थी। लेकिन तेज दिमाग के कारण वे पेंटिंग, डांस, ग्रीटिंग आदि बना लेती है। १४ साल पहले वे यहां आई है जिसके बाद उसके ज्यादा सुधार आया। आज वे निजी स्कूल में असिस्टेंट लाइब्रेरीयन के पद पर है। और सारा काम वे खुद ही करती है।
विशाल रंजन गौतम
करीब दस साल पहले विशाल रंजन गौतम ने रोशनी आश्रम आया। उसे सेलीब्रेल पॉल्सी की शिकायत थी। उस समय न वह ठीक से चल सकता था और न हीं वह अपने शरीर को बैलेंस कर पाता था। साथ ही उसे बोलने में भी काफी समय लगता था। लेकिन यहां आने के बाद धीरे-धीर उसमें सुधार आया। जिसके कारण वे दसवीं पास कर ली।

शशी जौहरी
मस्कूलर डिस्टॉफी यानी उठने, बैठने, चलने फिरने से लाचार। बीकॉम करने के बाद वे कई भी जॉब नहीं करने के कारण परेशान थे। क्योंकि वे खुद से कोई भी कार्य नहीं कर सकते है। कपड़े बदलने के लिए भी किसी की सहारा की जरूरत होती है। रोशनी आश्रम ने उन्हें ट्रेनिंग दिया गया। आज वे वहां के एकाउंट का काम बखूबी कर रहे है।

बीकॉम करने के बाद मुझे बैंक में जॉब मिल गई थी। लेकिन मैंने बैंक की जॉब कि जगह (ऑटिज्म, सेलिबेल पॉल्सी आदि) ऐसे बच्चों के लिए काम करना पसंद किया। क्योंकि मेरा भाई भी इसी से ग्रस्त है। ऐसा कोई भी बच्चा आता है तो मुझे मेरे भाई की तरह लगता है। आज 18 साल हो गए इन स्पेशल बच्चों के साथ। शुरु के दिनों में थोड़ा परेशानी आई लेकिन अब सभी बच्चों के लिए मैं एक मां की तरह हूं।

शुभा सरदाना कांडा
ऐसे बच्चों को कभी हैंडल नहीं किया। शुरु के दिनों में मुझे काफी परेशानी आई। क्योंकि मुझे में पेन्शस कम था। लेकिन इस स्पेशल बच्चों की स्पेशल केयर के लिए मैंने कई कोर्स किए जिससे बाद आज कोई भी परेशानी नहीं है। अगर इनमें थोड़ा से भी सुधार आता है तो लगता है कि मेरा परिश्रम सफल रहा।

डॉक्टर्स का सहयोग जरूरी
ऐसे बच्चों को ठीक करने में डॉक्टर का सहयोग बहुत जरूरी है। आज भी कुछ ही डॉक्टर्स ऐसे बच्चों को हमारे पास भेजते है। अगर कम उम्र में ही बच्चे हमारे पास आए तो काफी हद तक उसे नॉर्मल बनाने का प्रयास हो सकता है।