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ऐसी प्याऊ जहां पानी पीते हैं जंगली जानवर

श्री जम्भेश्वर पर्यावरण एवं जीवरक्षा संस्था एवं वन विभाग ने पहली बार रोही के जानवरों की प्यास के बारे में सोचा और उन इलाकों में प्याऊ का निर्माण कराया है ।

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Jai Narayan Purohit

May 15, 2016

water hut in rural area of Hanumangarh

water hut in rural area of Hanumangarh

हनुमानगढ़. गर्मी के मौसम में मनुष्यों की प्यास बुझाने के लिए हर जगह प्याऊ खुल जाती है। पुण्य कमाने के लिए पर्व विशेष पर छबीलें लगाकर ठंडा पानी और शरबत पिलाया जाता है। चिंता परिंदों की प्यास की भी रहती है सो उनके लिए परिंडे बांध दिए जाते हैं। लेकिन खेतों में रहने वाले जानवरों की प्यास की चिंता कोई नहीं करता। जल संसाधन विभाग ने नहरें पक्की करते समय इन जानवरों के पानी पीने के लिए गऊ घाट बनाए हैं परन्तु नहरों में बंदी होने पर वे जानवर अपनी प्यास कैसे बुझाते होंगे, इस पर शायद ही किसी ने विचार किया हो। शायद यही वजह है कि भीषण गर्मी के मौसम में नहर बंदी होने पर खेतों में रहने वाले जानवर पानी की तलाश में भटकते हुए दम तोड़ जाते हैं।

श्री जम्भेश्वर पर्यावरण एवं जीवरक्षा संस्था एवं वन विभाग ने पहली बार रोही के जानवरों की प्यास के बारे में सोचा और उन इलाकों में प्याऊ का निर्माण कराया है जहां हिरण आदि जानवर बहुतायत में है। संस्था एवं वन विभाग ने पीलीबंगा तहसील के गांव लखासर व हरदयालपुरा के पास ऐसे कई स्थान चिन्हित कर प्याऊ बनवाई है। खेतों में रहने वाले जानवर अपनी रिहायश के आसपास प्याऊ बनने से अब प्यासे नहीं मरेंगे।

यहां कराया निर्माण

श्री जम्भेश्वर पर्यावरण एवं जीवरक्षा संस्था के प्रदेश महासचिव अनिल बिश्नोई ने बताया कि लखासर रोही के चक 10 एलकेएस व 8 एलकेएस में संस्था के कार्यकर्ताओं ने प्याऊ बनाई है। यह इलाका ठेठ बारानी है और दूर तक पानी का नामोनिशान नहीं। इस इलाके में बड़ी संख्या में जानवरों की रिहायश है। इसके अलावा हरदयालपुरा के चक 3 व 6 एचडीपी में भी प्याऊ बनाई है।

स्थाई व अस्थाई

संस्था ने लखासर व हरदयालपुरा क्षेत्र में स्थाई व अस्थाई दो तरह की प्याऊ बनवाई है। स्थाई प्याऊ पक्की ईंटों से बनी है जबकि अस्थाई प्याऊ के लिए पहले गड्ढा खोदकर उसमें प्लास्टिक शीट बिछाई गई है ताकि पानी का रिसाव नहीं हो। इन प्याऊ में पानी टैंकरों से भरा गया है। पानी कम होते ही और टैंकर मंगवा कर प्याऊ को भर दिया जाता है।

पीने लगे हैं पानी

संस्था के कार्यकर्ताओं को उनकी मेहनत का फल मिलने लगा है। अनिल बिश्नोई ने बताया कि सभी प्याऊ का निरीक्षण करने पर वहां जानवरों के पांवों के निशान मिले हैं। इससे लगता है कि जानवरों का पानी का स्रोत मिल गया है और वे नियमित रूप से इन प्याऊ पर पानी पीने के लिए आने लगे हैं। संस्था कुछ और स्थानों पर प्याऊ बनाने की योजना पर विचार कर रही है ताकि पानी के अभाव में किसी जानवर की मौत नहीं हो।

इनका रहा सहयोग

इस कार्य में श्री जम्भेश्वर पर्यावरण एवं जीवरक्षा संस्था के प्रदेश महासचिव अनिल बिश्नोई, उपाध्यक्ष विनोद धारणिया, सदस्य लक्ष्मण धारणिया,शिव कुमार धारणिया, लखासर सरपंच भूपसिंह सिहाग, विनोद डेलू, वनपाल लेखराम, महावीर सांवक, सतपाल डेलू, विनोद धारणिया व पवन कुमार का सहयोग रहा।