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अक्षय तृतीया 2020: अंग्रेज इस धर्म से हुए थे प्रभावित, चला दिए थे चांदी के विशेष सिक्के

जैन धर्म में वर्षीतप का खासा महत्व है।

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हरदा

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Rajiv Jain

Apr 26, 2020

अक्षय तृतीया 2020: अंग्रेज इस धर्म से हुए थे प्रभावित, चला दिए थे चांदी के विशेष सिक्के

अक्षय तृतीया 2020: अंग्रेज इस धर्म से हुए थे प्रभावित, चला दिए थे चांदी के विशेष सिक्के

खिरकिया। जैन धर्म में वर्षीतप का खासा महत्व है। श्रावक-श्राविकाएं कई वर्षों तक निरंतर यह तप करते हंै। इस एक तप को पूर्ण होने में अलग अलग विधि से 2 एवं 4 वर्षों में किया जा सकता है। नगर में यह वर्षीतप श्राविकाओं की ओर से किया जा रहा है। वर्षीतप से ब्रिटिश शासन काल के दौरान अंग्रेज इतने प्रभावित हुए कि ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा करीब 202 वर्ष पूर्व वर्ष 1818 में एक आना का सिक्का जारी किया गया। इसमें एक ओर ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम व सन् लिखा हुआ है। दूसरी ओर वर्षीतप के बाद आदिनाथ भगवान का पारणा करते हुए चित्र प्रदर्शित किया गया। यह जैन धर्म के लिए गौरव की बात है। 26 अप्रेल को अक्षय तृतीया पर समूचे देश में वर्षीतप करने वाले जैन श्रावक श्राविकाओं का पारणा ईच्छुरस (गन्ने का रस) का सेवन कराकर परिवार व समाजजनों द्वारा कराया जाएगा।

इसलिए कठिन माना गया वर्षीतप
इस तप का शुरुआत फाल्गुन कृष्णा अष्टमी से होती है। इसमें 400 दिनों तक अर्थात 13 महीने और 11 दिवस एकांतर उपवास किया जाता है। इस तप के दौरान एक साथ 2 दिन भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है। एक दिन यानि पहले दिन केवल जल पर आधारित उपवास किया जाता है, फिर दूसरे दिन अन्न ग्रहण किया जाता है। वह भी दो बार ही किया जाता है। प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव परमात्मा को दीक्षा अंगीकार करने के बाद लाभांतराय कर्म का उदय होने से 400 दिन तक उन्हें निर्दोष आहर नहीं मिला । इस कारण उन्होंने दीक्षा दिन से 400 निर्जल उपवास किए थे। ऋषभदेव के तप की स्मृति में यह वर्षीतप किया जाता है। इसे संवत्सर तप भी कहा जाता है। वर्षीतप की अवधि उपवास वालों के लिए 2 वर्ष एवं एकासन तप के लिए चार वर्ष में पूर्ण होता है।

इसलिए है इस दिन का महत्व
जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी-गन्ने) रस से पारायण किया था। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बंधनों को तोडऩे के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया। सत्य और अहिंसा के प्रचार करते-करते आदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहां इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा सोमप्रभु के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर उसने आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया, जिससे आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया।

400 दिवस की तपस्या के पश्चात पारायण किया

भगवान आदिनाथ ने लगभग 400 दिवस की तपस्या के पश्चात पारायण किया था। यह लंबी तपस्या एक वर्ष से अधिक समय की थी अत: जैन धर्म में इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है। आज भी जैन धर्मावलंबी वर्षीतप की आराधना कर अपने को धन्य समझते हैं, यह तपस्या प्रति वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होती है और दूसरे वर्ष वैशाख के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है।