6 अप्रैल 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

चारूवा मेले में लुभा रहे बाणगंगा नदी किनारे लगे ऊंचे झूले

-कभी हुआ करता था मेले की शान, अब सिमट गया बैल बाजार-

3 min read
Google source verification
चारूवा मेले में लुभा रहे बाणगंगा नदी किनारे लगे ऊंचे झूले

चारूवा मेले में लुभा रहे बाणगंगा नदी किनारे लगे ऊंचे झूले

खिरकिया. भगवान गुप्तेश्वर की पावन नगरी के नाम से प्रसिद्ध ग्राम हरिपुरा चारूवा में महाशिवरात्रि से आयोजित किया जा रहा मेले में अब रौनक बढ़ गई है। रविवार को मेले में खासा उत्साह देखने को मिला। एक सप्ताह की सुस्ती के बाद अब मेले में भीड़ बढ़ती जा रही है। ज्यों-ज्यों मेला समापन की ओर बढ़ेगा, लोगों की भागीदारी और बढ़ती जाएगी। मेले में लगने वाली दुकानों पर खरीददारी के लिए दूर-दराज के क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। रंग बिरंगी लाइट में चमक रहा मंदिर परिसर लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। शाम होते रोजाना मेले में भीड़ बढ़ जाती है। आगामी समय में मेले में उत्साह आने की उम्मीद व्यवसायियों द्वारा जतायी जा रही है। जितना गौरवशाली इतिहास गुप्तेश्वर मंदिर का रहा है, उतना ही महत्व चारूवा मेले के इतिहास है। यहां जिले या स्थानीय लोगों के अलावा प्रदेश के कई शहरों से श्रृद्धालु पहुंचते है। जो पहले भगवान गुप्तेश्वर के दर्शन करने के पश्चात मेले का लुत्फ उठाते है। चारूवा नगरी में भगवान गुप्तेश्वर की उत्पत्ति के बाद ग्रामीणों द्वारा उत्साह पूर्वक मेले का आयोजन किया गया। जिसके बाद से यह क्रम आज तक जारी है। जिन पुराना मंदिर का इतिहास है, उतना ही पुराना मेले का इतिहास है।
राई झूला और मौत का कुंआ है प्रसिद्ध-
मौत का कुआं भी भीड़ को अपनी ओर खींच रहा है। मेले के प्रारंभिक समय में यहां कुछ ही दुकानें लगती थी, लेकिन मेले की प्रसिद्धि वर्ष दर वर्ष बढ़ती गई। मेले में धीरे धीरे झूलों का आना प्रारंभ हुआ। जो आज भी मेले की शान बना हुआ है। मेले में नदी किनारे स्थापित किए जाने वाले बड़ा राई झूला एंव मौत का कुंआ प्रसिद्ध है। प्रतिदिन सैकड़ों नागरिक मेले में झूले का लुत्फ उठाते है। मेले की उंचाई से समूचा मेला परिसर और गांव साफ साफ देखा जा सकता है। यहां लगने वाला मौत का कुंआ हैरतअंगेज करतबों के लिए जाना जाता है। परिसर में लगे मौत का कुआं, बड़ा झूला, चरखी झूला, नाव झूला, रेल झूला आदि पर बैठने के लिए लोग लाइन लगाकर अपनी बारी आने का इंतजार करते दिखते है। बच्चों के लिए झूले, छोटा तारामाची, मिक्की माउस, ड्रेगन झूला लगाया गया है। मौत का कुआं में चलती बाइक और कार दर्शकों को रोमांचित कर रहा है।
स्ट्रीट फूड बढ़ा रहा मेले का स्वाद-
मेला में आने वाले लोगों की पसंद के अनुसार जगह-जगह पर फुड स्टॉल लगाए गए है। जहां लोग व्यंजनों के चटकारे लेते दिखते है। कोई फास्ट फूड तो कोई चाट खाते दिख जाता है। आइसक्रीम के ठेले व ज्यूस के स्टॉल पर भी लोगों की भीड़ लग रही है। मेले में भेल, डोसा मसाला, नूडल्स, मंचूरियन जैसे चाइनीज फुड की दुकानें भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।
कभी हुआ करता था मेले की शान, अब सिमट गया बैल बाजार-
मेला एवं मंदिर परिसर के पीछे सैकड़ों एकड़ खाली भूमि पर बैल बाजार लगता रहा है, हालांकि वर्तमान मेंं अब यह सिमटकर रह गया है। बैलों एवं अन्य मवेशियों की खरीदी बिक्री के लिए मेला सशक्त माध्यम माना जाता था। जहां सैकड़ों की संख्या में पशु पालक क्षेत्र सहित अन्य शहरों एवं गांवों से अपने मवेशी विक्रय के लिए लाते थे। प्रतिदिन दर्जनों मवेशियों का सौदा मेले में किया जाता रहा है। एक समय में मेले की प्रसिद्धि का मुख्य अंग रहा बैल बाजार वर्तमान में अब कुछ क्षेत्र मे शेष रह गया है। जो धीरे धीरे लुप्त होता जा रहा है।
जत्रा के नाम से प्रसिद्ध था मेला-
पूर्व मे चारूवा मेला जत्रा के नाम से प्रसिद्ध था। प्रारंभ मे गांव के ही कुछ व्यवासियों ने मेले में दुकानें लगाना प्रारंभ की। धीरे-धीरे आसपास की तहसीलों सहित जिले और अब वर्तमान में प्रदेश के कई जिलों से व्यवसायी यहां दुकानें लगाने पहुंचते है। प्राचीन समय से लेकर वर्तमान परिवेश मे मेले में कई बदलाव आए है, लेकिन मेले के आयोजन को लेकर क्षेत्रवासियों को वर्षभर इंतजार रहता है। मेले में खाने पीने की सामग्री के लेकर मनोरंजन, गृह उपयोगी वस्तुए, खाद्य सामग्री, मिर्च मसाले, खेल खिलौने, लोहे की वस्तुएं सभी सामग्रियां उपलब्ध हो जाती है। जिसकी जमकर खरीदी लोगों द्वारा की जाती है।
इनका कहना है-
मेले में सभी व्यवस्थाएं चुस्त दुरूस्त की गई है। विभागीय अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। जिसकी निगरानी लगातार की जा रही है। मेले में अब श्रृद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है, जिससे मेले में रोमांच बढ़ता जा रहा है।
वीपी यादव, एसडीएम, खिरकिया