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मुझे जमीन का छोटा टुकड़ा नहीं चाहिए, मेरे हिस्से में पूरे आजाद भारत की भूमि आई है

छीपाबड़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दाधिच ने कहा था

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हरदा

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Sandeep Nayak

Aug 15, 2018

independence day 2018 special story

मुझे जमीन का छोटा टुकड़ा नहीं चाहिए, मेरे हिस्से में पूरे आजाद भारत की भूमि आई है

राजेश मेहता/खिरकिया। मुझे जमीन का छोटा टुकड़ा नहीं चाहिए, मेरे हिस्से में पूरे आजाद भारत की भूमि आई है। मैने आजादी के लिए आंदोलन किया था। देश को आजादी मिल गई है, यही मेरे के लिए सबसे बड़ी धरोधर है। अब मुझे भारत की आजादी में सहयोग के लिए जमीन जायदाद नहीं चाहिए।
यह जवाब था छीपाबड़ के क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिवदत्त दाधिच का, जिन्हें सरकार ने आजादी में योगदान देने पर जमीन देने की पेशकश की थी। और उन्होंने यह कहते हुए, ठुकरा दी थी। वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी पत्नी संसारवती देवी को आज भी उनके योगदान को याद कर गर्भ महसूस करती हैं। उनकी चारों बेटियों की शादी हो गई है, वे यहां अकेली रहती है। सरकार द्वारा दी जा रही पेंशन से उनका गुजारा हो रहा है।
एक समय इनके जीवन में खाने के लाले पड़ गए थे, तब ग्रामवासियों ने सहयोग किया था। आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर मुख्यमंत्री द्वारा शिवदत्त दाधिच को मरणोपरांत स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने पर उनकी पत्नी को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया था।

डॉ. हेडगेवार के साथ वर्धा जेल में रहे
छीपाबड़ के शिक्षक महेश तिवारी ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम मेें शिवदत्त को कई बार जेल यात्राएं भी करनी पड़ी। वे वर्धा जेल में डा. हेडगेवार के साथ बंद थे। दाधिच शासकीय हॉस्पिटल में डॉक्टर थे। उन्होंने 1940 में अंग्रेजी मशीनरी को ठप्प करने के लिये आंदोलन चलाया था। उन्होंने नोकरी छोड़ दी और अंग्रेजी हुकुमत से मिलने वाली शासकीय सुविधाओं का स्वीकार नहीं किया। उन्होंने रेल यात्रा तक नहीं की और होशंगबाद तक पैदल जाते थे। करीब 70 वर्ष की उम्र में 1973 में उनका निधन इटारसी मे हो गया था। होशंगाबाद में उनका अंतिम संस्कार किया गया था।

छीपाबड़ के सत्येन्द्र लहरी भी रहे सेनानी
छीपाबड़ के ही सत्येन्द्र लहरी भी शिवदत्त दाधिच के साथी थे। लहरी संस्कृत के विद्वान थे। उस समय क्षेत्र के सभी पंडित उनसे मार्गदर्शन लेते थे। सत्येन्द्र लहरी को भी प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। सत्येन्द्र लहरी की भी दो बेटियां है। लहरी के कोई भी परिजन छीपाबड़ में अब नहीं रहते हैं।