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निरक्षरता से साक्षरता की ओर कदम, घर-घर जाकर लालटेन में लोगों को पढ़ाया

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस विशेष - शिक्षित हुए ग्रामीणों ने कलेक्टर को पोस्टकार्ड लिखकर खुलवाया था स्कूल

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निरक्षरता से साक्षरता की ओर कदम, घर-घर जाकर लालटेन में लोगों को पढ़ाया

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राजेश मेहता, खिरकिया। निरक्षर गांव में साक्षरता की अलख जलाने वाले को न सिर्फ मान सम्मान मिला, बल्कि शासकीय नौकरी भी मिल गई। आज गांवों तक शिक्षा पहुंची है, लेकिन जब गांवों में शिक्षा नहीं मिलती थी, तब इसके प्रति लोगों को जागरुक करना और शिक्षा की मुख्यधारा से जोडऩा छोटी बात नहीं होगी। लेकिन यह कमाल ग्राम पोखरनी में शिक्षक रूपदास वैष्णव ने कर दिखाया। इसके परिणाम स्वरूप आज वे शासकीय स्कूल में पदस्थ होकर ग्रामीणों को शिक्षित कर रहे हैं। वर्ष 2000 में साक्षरता दर बढ़ाने एवं अशिक्षितों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए मप्र सरकार की ओर से पढऩा-बढऩा अभियान चलाया गया। इसमें ग्राम पोखरनी उबारी में विभिन्न स्थानों पर कक्षाएं संचालित की गई थीं। अभियान के तहत रूपदास वैष्णव ने लगभग आधा सैकड़ा निरक्षरों को साक्षर बनाया। साक्षर बनते ही ग्रामीणों ने तत्कालीन कलेक्टर को पोस्टकार्ड लिखकर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए निवेदन किया। उन पत्रों को देखकर जिले के तत्कालीन कलेक्टर ने अभियान के गुरुजी रूपदास वैष्णव को सम्मानित किया था। ग्रामीणों के निवेदन को स्वीकार करते हुए पोखरनी उबारी के लिए शिक्षा गारंटी केंद्र की स्वीकृति दी गई। जिस केंद्र में ग्रामीणों के बच्चों ने शिक्षा से जुड़कर अपनी पढ़ाई आज तक जारी रखी है। ग्राम में गुरुजी कहलाने वाले रूपदास वैष्णव को पढऩा-बढऩा आंदोलन के फलस्वरूप शिक्षा विभाग में नौकरी मिल गई। एक समय था जब गांव में विद्यालय नहीं था। बच्चे शिक्षा से दूर थे, लेकिन बिना किसी स्वार्थ और लगन से शिक्षक वैष्णव ने शिक्षा को गांव में स्थापित किया। आज गांव के सभी बच्चे स्कूल में अध्ययन करते हैं। बिना नौकरी के लोगों को साक्षर बनाने का वैष्णव का प्रयास आज नौकरी पाने के बाद भी जारी है।
लालटेन लेकर लोगों को घर-घर जाकर पढ़ाया
रूपदास वैष्णव की पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन वे खुद शिक्षित हुए। जितनी शिक्षा उन्होंने ग्रहण की उससे ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया। पारिवारिक कठिनाइयों के बावजूद लोगों के घर रातों में लालटेन ले जाकर पढ़ाया। उन्होंने बच्चों को तो साक्षरता दिलाई ही, लेकिन अधेड़ उम्र के पालकों को भी शिक्षा का पाठ पढ़ाया। जिन लोगों को साक्षर किया उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने शासन से स्कूल की मांग की।
अधेड़ उम्र में हुए साक्षर, आज पढ़ रहे रामायण और चला रहे मोबाइल
शिक्षक वैष्णव के माध्यम से साक्षर हुए लोग आज रामायण पढ़ रहे हैं। इसके अलावा मोबाइल भी चला रहे हैं। सभी अपने बच्चों को पढ़ाने में रुचि रख रहे हैं। निरक्षरों के साक्षर होने से वे शिक्षा के महत्व को समझे और अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षा के लिए प्रेरित कर रहे हैं। गांव में साक्षरता आने से प्रतिवर्ष श्रावण माह में पूरे एक माह रामायण पढऩे का उत्साह बढ़ता गया। मोबाइल चलाना सीखने से देश दुनिया की जानकारी लेने लगे।