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ट्रैक्टरों की जुताई से मिट्टी कठोर बन रही, रिसाव क्षमता कम होने से थोड़ी बारिश में ही लबालब हो रहे खेत

नालों का प्राकृतिक बहाव मोडऩे और बगैर तकनीक के खेतों की लेवलिंग से थोड़ी भी जलमग्न हो जाती है फसल

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हरदा

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Sanjeev Dubey

Aug 10, 2019

Rain water filled in the fields

Rain water filled in the fields

हरदा. खेती में मशीनों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी कठोर बनती जा रही है। इससे पानी के रिसाव की गति बेहद कम होते जा रही है। जिसके चलते थोड़ी बरसात होने पर ही खेतों में लगी फसल जलमग्न हो जाती है। इससे उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। खास बात यह है कि अधिकतर किसान खेतों के जलभराव की स्थिति को दूर करने को लेकर जरा भी फिक्रमंद नहीं है। इससे बरसाती व सिंचाई के पानी का भराव फसल खराब कर रहा है। कृषि के क्षेत्र में अलग पहचान बना चुके जिले में यूं तो किसान उन्नत खेती की ओर अग्रसर हैं, लेकिन उनके द्वारा एक महत्वपूर्ण बात को नजरअंदाज किया जा रहा है। खेतों में जलनिकासी के उचित प्रबंध नहीं होने से थोड़ी सी बरसात होने पर ही फसलें डूबने लगती हैं। जहां नजर पड़ती है वहां खेत बरसाती पानी से लबालब भरे दिखाई देते हैं। बारिश थमने पर पानी निकासी होती है, लेकिन उतनी नहीं हो पाती, जितनी फसल की सेहत के लिए जरूरी रहता है। लबालब पानी भराने से फसल खराब होने के साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति पर भी असर पड़ रहा है। खेत की मेढ़ों पर वृक्षों की संख्या कम होते जाने से भी तेज बारिश के दौरान ऊपजाई मिट्टी भी बड़ी मात्रा में बह रही है।

बारह घंटे से ज्यादा जल निकासी फसल के लिए जहर समान
खेतों में अत्यधिक जलभराव को कृषि वैज्ञानिक फसल के लिए नुकसानदायक बताते हैं, इसके बावजूद किसान इस दिशा में उचित कदम नहीं उठाते। कृषि महाविद्यालय इंदौर के सेवानिवृत्त डीन डॉ. आरएन सारन बताते हैं कि जल ही जीवन है लेकिन फसल के लिए जल ही जहर भी है। खेतों में 12 घंटे से ज्यादा जलभराव जहर समान बन जाता है। डॉ. सारन के मुताबिक जमीन में वायु है। पौधे ऑक्सीजन लेते हैं। खेतों में पानी भरा रहने से ऑक्सीजन समाप्त होते जाती है। इसे पौधे के बजाए सूक्ष्म जीव ले लेते हैं। सूक्ष्म जीव नाइटे्रट (एनओथ्री) को नाइट्रस ऑक्साइड में (एनओटू) में बदल देते हैं। इससे पौधों को ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इस प्राणपद वायु के न मिलने से पौधे पीले पड़ जाते हैं और उत्पादन प्रभावित होता है। खेत की उर्वराशक्ति बढ़ाने के लिए जो रासायनिक खाद फेंका जाता है वह 12 घंटे बाद फसल के लिए जहर बन जाता है। उन्होंने बताया कि जमीन का पानी सोखना बेहद जरूरी है, लेकिन यह स्थिति दिनोंदिन कम होते जा रही है। पहले खेती-किसानी में हल्के हल-बक्खर का उपयोग होता था। इससे जमीन अधिक सख्त नहीं होती थी। अब हैवी टै्रक्टर्स हंै। चाहे 5 एकड़ का कास्तकार (किसान) हो या १०० एकड़ का, सभी ट्रैक्टर और हार्वेस्टर सहित अन्य मशीनों का उपयोग करते हैं। इससे जमीन टिपाती (कठोर होती) है। उसमें पानी समाने की गति कम हो रही है। अत: बारिश के पानी की समय पर निकासी फसल में खाद देने से ज्यादा जरूरी है। लेकिन किसान घर में बैठा रहता है। उसे कितनी ही मेहनत करना पड़े पानी निकासी करना चाहिए। डॉ. सारन ने बताया कि रबी सीजन में सिंचाई के दौरान भी ऐसा होने पर फसल को नुकसान होता है।

अमेरिका में ढाई फीट गहरी जुताई, हमारे यहां अधिकतम 9 इंच
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सारन के मुताबिक चार साल अमेरिका में अध्ययन के दौरान देखा कि वहां के किसान ढाई फीट गहरी जुताई करते हैं। खेतों में नालियां बनाते हैं, ताकि बारिश के पानी की निकासी हो सके। यह प्रक्रिया हर एक दो साल बाद अपनाई जाती है। इस स्थिति में जमीन में पानी का रिसाव भी होता है। लेकिन भारत के किसान खेतों की जुताई ६ से ९ इंच ही कर रहे हैं। फसल में कुल्पा चलाने तक में ट्रैक्टर का उपयोग हो रहा है। गोबर खाद का उपयोग न होने से भी जमीन कठोर बनती जा रही है। यह भी जलभराव की स्थिति बनी रहने का बड़ा कारण है।

मेढ़ों की चौढ़ाई घटने से भी बना रहता है जलभराव
उप संचालक कृषि एमपीएस चंद्रावत के अनुसार किसान अपने खेतों में जलनिकासी का इंतजाम नहीं करते। पहले मेढ़ चौढ़ी होने से जलभराव की स्थिति पर नियंत्रण रहता था। किसान जलनिकासी की तकनीकी पद्धति को भी नहीं अपनाते। कई फीट चौढ़ी मेढ़ अब छह से आठ इंच की बची है। इन पर लगे पेड़ों की संख्या भी कम होते जाने से तेज बारिश के दौरान मिट्टी कटती है। लगातार जलभराव से फसल पीली होकर खराब होने लगती है।

एक नजर : जिले की कृषि भूमि और यंत्र
- 97244 किसान हैं जिले में
- 1८३००० हेक्टेयर है कृषि रकबा
- ९५०० टै्रक्टर है जिले में
- ४००० टै्रक्टर हैं हरदा तहसील के किसानों के पास