
साधारण सी घरेलू लडक़ी जो अपनी जिद से बन गयी अंतररष्ट्रीय खिलाड़ी
नवनीत द्विवेदी
हरदोई. पूरी दुनिया आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है। इस मौके पर मिलिए हरदोई की एक ऐसी साहसी महिला से जिसका जीवन संघर्षों की कहानी है। लेकिन, हौसलों की उड़ान और सपनों में जान होने की वजह से इस महिला ने सफलता की नई इबारत लिख दी। हरदोई ही नहीं यह देश-प्रदेश में वेटलिफ्टिंग और पावर लिफ्टिंग की जानी पहचानी नाम बन चुकी हैं।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पत्रिका से बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके इरादे बुलन्द हैं। वह खेल की दुनिया में गरीब बच्चों को खासतौर से दिव्यांग बच्चों को सफलता का नया स्वाद चखा रही हैं। उन्हें सपने तो दिखा ही रही हैं बल्कि उनके हौसलों में जान भरने का भी काम कर रही हैं। वेटलिफ्टिंग और पावर लिफ्टिंग कोच पूनम तिवारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ढेर सारे पदक जीतकर भारत की झोली में डाल चुकी हैं। इस समय वह हरदोई स्टेडियम में वेटलिफ्टिंग कोच होने के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले आयोजनों में मैच रेफरी की भूमिका निभाती हैं। पूनम तिवारी ने कहा कि 'उस पथ के पथिक की धैर्य परीक्षा क्या जिस पथ पर पड़े शूल न हों, नाविक की धैर्य परीक्षा क्या जब धाराएं प्रतिकूल न हों। यह कहते-कहते पूनम तिवारी अपनी पुरानी यादों में खो जाती हैं।
हाकी से वेटलिफ्टिंग में किया शिफ्ट
नम आंखों के साथ जब बीते दिनों को याद करती हैं तो उनकी संघर्ष की एक लंबी प्रेरणादायक कहानी सामने आती है। पूनम बताती हैं कि दो भाइयों और 3 बहनों सबसे बड़ी होने के नाते पूरे घर की जिम्मेदारी उनके ऊपर थी। क्योंकि, उनके पिता हृदय रोग से पीडि़त थे और माताजी भी बीमार रहती थीं। हालांकि, उनके माता-पिता ने उन्हें पढ़ाने का पूरा प्रयास किया। लेकिन आगे की जिम्मेदारी पूनम तिवारी को खुद उठानी पड़ी। इस समय करीब 42 बरस की हो चुकीं पूनम तिवारी बताती हैं गंगा देवी इंटर कॉलेज में कक्षा 6 में पढऩे के दौरान तो उनकी रुचि हाकी में हुई। उन्होंने खेलना शुरू किया। माता-पिता और टीचर ने सहयोग दिया जिसके कारण स्टेट लेबल तक पहुंची। लेकिन, स्टेट टीम में जगह न मिल पाने के कारण रूख वेटलिफ्टिंग की ओर कर दिया। और 90 के दशक में बहुत कम उम्र में मुरादाबाद में वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। बेहतरीन प्रदर्शन ने पूनम को आगे बढने के लिए प्रेरित किया। ऐसे में वह समय भी आया जब उनका चयन लगातार 1996 और 1999 में हुआ। एक समय ऐसा भी आया जब विदेश में होने वाली प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए आर्थिक तंगी आड़े आई। 2001 में उनका फिर से अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए चयन हुआ।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने की मदद
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समर्थन करते हुए उनके लिए किराए का प्रबंध किया। इस बार वह स्वर्ण पदक और रजत पदक लेकर जिले का नाम रोशन किया। तमाम समस्याओं से जूझते हुए और खेल में मिलने वाले पुरस्कारों से जैसे-तैसे घर परिवार चलता रहा इसी बीच उनके हमसफऱ बने अंतरराष्ट्रीय पावर लिफ्टर खिलाड़ी आरडी तिवारी ने भी साथ दिया। इसके बाद पूनम को एशियाई देशों की वेट लिफ्टिंग खेलों में रेफरी की भूमिका के लिए चुना गया। इस बीच पूनम तिवारी जिले में वेट लिफ्टिंग कोच बन गईं। इसके बाद से वह गरीब और होनहार बच्चों को खास तौर से दिव्यांग बच्चों को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं। करीब 30 बच्चों का बैच वेट लिफ्टिंग और पावर लिफ्टिंग की शिक्षा ले रहा है। इससे पहले के तमाम खिलाड़ी प्र्रदेश और देश स्तर पर खेल चुके हैं। अब पूनम तिवारी को तलाश है ऐसे खिलाड़ी की जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल कर के जिले और देश के लिए पदकों का ढेर लगा सके। उनकी इच्छा है जिले के बच्चे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेंले। अपने देश के लिए पदको का ढेर लगाएं।
Updated on:
08 Mar 2018 03:00 pm
Published on:
08 Mar 2018 07:00 am
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