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वह 15 साल से जिंदा है, लेकिन सरकार ने उसे मार डाला, कैसे मरा जिंदा इंसान पढ़ें ये कहानी

15 साल से जिंदा साबित करने की लड़ाई लड़ रहा रामलाल

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हरदोई

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Ruchi Sharma

Mar 01, 2018

sultanpur

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सुल्तानपुर. खुद को जिंदा साबित करने के लिए रामलाल को 15 साल बीत गए, लेकिन अभी भी राजस्व विभाग उन्हें जिंदा मानने को तैयार नहीं है।

राजस्व विभाग की महिमा बड़ी निराली है। गांवों में आधे विवाद, लड़ाई, झगड़ों की देन राजस्व विभाग है। रामलाल को राजस्व अभिलेखों में बीस साल पहले मृत दिखा दिया गया था। रामलाल को जानकारी होने पर खुद के जिंदा होने का सबूत देता रहा पर राजस्व विभाग उसे मृतक मानता रहा।

वह व्यक्ति जिंदा है ,लेकिन अब जिंदगी से थक गया है। जबकि राजस्व विभाग के ही जिम्मेदार अधिकारी उपजिलाधिकारी द्वारा उसका निवास प्रमाण पत्र भी जारी किया जा चुका है। आज वह ग्राम पंचायत सदस्य भी है, उसके पास बैंक पासबुक, राशन कार्ड, आधारकार्ड,मतदाता पहचान पत्र भी है, इतने साक्ष्य के बावजूद वह आज मृतक है।

मामला विकास खंड बल्दीराय के हंसुई मुकुंदपुर गांव का है। यहां के रामलाल मिश्र पुत्र ब्रह्मा दीन 1986 से घर से रोजी-रोटी की तलाश में निकल गए और छुट्टी मिलते ही बीच-बीच में घर आते रहे। रामलाल के मुताबिक एक बार वह 10 साल बाद 2002 में घर आया तो उसे पता चला कि राजस्व अभिलेखों में उसको मृत दिखाकर उसकी जमीन उसकी पत्नी लीलावती के नाम हो गई है। रामलाल ने अपने को जीवित होने संबंधी एक वाद तहसीलदार मुसाफिरखाना के यहां पुनः जमीन अपने नाम करने की याचना 2003 में की, जिस पर 4 साल बाद तहसीलदार मुसाफिरखाना द्वारा 13 दिसंबर 2007 को मात्र स्थगनादेश दिया गया कि रामलाल जीवित हैं।

जमीन खुर्द बुर्द होने की संभावना है। 28 मई 1998 का आदेश स्थगित किया जाता है, वाद चलता रहा। 2009 में लीलावती ने अपनी एकमात्र संतान विवाहित पुत्री गीता व अपनी जेठानी राम सवारी देवी को अपने नाम की समस्त जायदाद बैनामा कर दी। जिसकी खारिज दाखिल न हो इसमें तहसीलदार मुसाफिरखाना के यहां रामलाल ने आपत्ति लगा दी, जो वाद विचाराधीन आज भी है।

जमीन खरीदार यहीं नहीं रुके इधर यह गांव अब सदर तहसील में हो गया है तो गीता देवी आदि ने जमीन की खारिज दाखिल अपने नाम करने का एक दूसरा मुकदमा नायब तहसीलदार सदर के यहां दायर करके 22 जनवरी को जमीन की खारिज दाखिल करवा ली। रामलाल चिल्लाते रहे उनकी एक न सुनी गई। अब इसी बीच 11 फरवरी को लीलावती की मौत हो गई, लीलावती के मौत के बाद से और रामलाल राजस्व विभाग के कानूनी मकडज़ाल में ऐसा उलझ गया हैं कि उनके सामने बकौल रामलाल खुदकुशी के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है।