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UP के इस शहर में मिला स्वामी विवेकानंद को पहला शिष्य! 99% लोग नहीं जानते यह ऐतिहासिक सच

12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस पर स्वामी विवेकानंद की जयंती मनाई जाती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के हाथरस शहर में उन्हें पहला शिष्य मिला था।

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हाथरस

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Anuj Singh

Jan 12, 2026

Swami Vivekanand

Photo: Patrika

Swami Vivekananda Jayanti: आज 12 जनवरी है, स्वामी विवेकानंद की जयंती। यह दिन पूरे देश में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनका जीवन साहस, ज्ञान और सेवा से भरा हुआ है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके जीवन में उत्तर प्रदेश के हाथरस शहर का एक खास और गहरा संबंध है।

हाथरस में पहली मुलाकात

साल 1888 में स्वामी विवेकानंद (उस समय वे परिव्राजक संन्यासी थे) वृंदावन से हरिद्वार की यात्रा पर थे। वे ट्रेन से हाथरस सिटी रेलवे स्टेशन पर रुके। उस सममय स्टेशन मास्टर थे शरतचंद्र गुप्ता। शरतचंद्र स्वामी जी के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए। उनकी आँखों में एक खास चमक देखी, जो उन्हें "दैवीय" लगी। उन्होंने स्वामी जी को अपने क्वार्टर में आमंत्रित किया और बातचीत शुरू की। शरतचंद्र न स्वामी विवेकानंद से शिष्य बनने की इच्छा जताई। लेकिन स्वामी जी ने उन्हें सीधे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने उनकी सच्चाई की परीक्षा ली।

कठिन परीक्षा और शिष्यत्व

स्वामी विवेकानंद ने शरतचंद्र से कहा कि अगर वे सचमुच शिष्य बनना चाहते हैं, तो स्टेशन पर कुलियों और मजदूरों से भिक्षा माँगकर लाएँ। यह परीक्षा इसलिए थी क्योंकि शरतचंद्र जी स्टेशन मास्टर थे और वे लोग उनके अधीनस्थ थे। अहंकार छोड़ना आसान नहीं था। शरतचंद्र ने बिना सोचे यह काम किया। उन्होंने अपने ही नीचे काम कर रहे लोगों से भिक्षा माँगी, भोजन इकट्ठा किया और स्वामी जी के पास लाए। दोनों ने मिलकर वह भोजन ग्रहण किया। इस परीक्षा में सफल होने पर स्वामी विवेकानंद ने उन्हें अपना पहला शिष्य स्वीकार किया। उनका नाम बदलकर स्वामी सदानंद रखा गया। शरतचंद्र ने तुरंत अपनी अच्छी नौकरी छोड़ दी। उन्होंने संन्यास लिया और स्वामी विवेकानंद के साथ यात्रा शुरू कर दी।

स्वामी सदानंद का योगदान

स्वामी सदानंद (या गुप्त महाराज) रामकृष्ण मिशन के शुरुआती दिनों में बहुत सक्रिय रहे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साथ कई यात्राएँ कीं। मद्रास (चेन्नई) में मिशन की स्थापना में उनका बड़ा हाथ था। वे बहादुर और सेवा-परायण थे। उन्होंने बहनों को "महाराज" कहकर संबोधित करने की परंपरा भी शुरू की, जो बाद में रामकृष्ण संघ में प्रचलित हो गई।

किताबों और फिल्म में जिक्र

यह प्रसंग रामकृष्ण मठ की कई किताबों में दर्ज है, जैसे "द लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानंद" और "मॉनास्टिक डिसाइपल्स ऑफ स्वामी विवेकानंद"। 1998 में बनी स्वामी विवेकानंद की बायोपिक फिल्म में भी इस घटना को दिखाया गया है। इसमें अनुपम खेर ने स्टेशन मास्टर (शरतचंद्र गुप्ता) का किरदार निभाया था। फिल्म में इस दृश्य को देखकर लोगों ने उसे बहुत ही प्रभावशाली बताया।

हाथरस में स्मृति का अभाव

इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रसंग के बावजूद हाथरस सिटी रेलवे स्टेशन पर स्वामी विवेकानंद की कोई प्रतिमा या बड़ा स्मारक नहीं है। कुछ जगहों पर शिलालेख की बात कही जाती है, लेकिन वह भी पर्याप्त नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ऐसा स्थान, जहाँ स्वामी जी का पहला शिष्य मिला, उनकी याद में कुछ खास नहीं रखता। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।