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गर्म तासीर की अलसी को साबुत या तेल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें मौजूद पोषक तत्त्व महिलाओं में मेनोपॉज की समस्या में मन और व्यवहार में बार-बार बदलाव की तकलीफ में फायदा करते हैं।
पोषक तत्व : इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। अलसी में प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, फाइबर, विटामिन बी, इ पोटैशियम और मैगनिशियम मिलता है।
ये हैं फायदे : अलसी के इस्तेमाल से वजन नियंत्रित, पाचन तंदुरुस्त, कैंसर, मधुमेह, कब्ज संबंधी समस्या में फायदेमंद है। अलसी को साबुत खाने से शरीर से विषाक्त तत्व निकलते (डिटॉक्सीफिकेशन) हैं।
इस्तेमाल : नियमित एक चम्मच भुनी हुई साबुत अलसी लेने से बाल, बेजान त्वचा, एलर्जी, पिंपल्स से बचा जा सकता है।
सावधानी : गर्भवती व स्तनपान करवाने वाली महिलाएं और अलसी के इस्तेमाल से एलर्जी वाले डॉक्टर की सलाह से इसका प्रयोग करें।
ईटिंग डिसऑर्डर से होता है एनोरेक्सिया
नियमित समय पर खाना न खाना लड़कियों के लिए एनोरेक्सिया का कारण बन सकता है। ईटिंग डिसॉर्डर जिसमें एनोरेक्सिया नर्वोसा, बुलिमिया नर्वोसा और बिंज ईटिंग डिसॉर्डर शामिल हैं। ये सब साइकोलॉजिकल डिसॉर्डर होते हैं इससे ईटिंग बिहेवियर प्रभावित होता है। एनोरेक्सिया नर्वोसा का असर 100 में एक किशोरी में देखा जाता है। एनोरेक्सिया की मरीज का वजन सामान्य से कम (आदर्श सीमा से आमतौर पर 15 प्रतिशत तक कम) होता है। यह समस्या अक्सर किशोरावस्था से वयस्कता के बीच के काल में देखने में आती है। घंटों तक एरोबिक एक्सरसाइज भी किशोरियों में एनोरेक्सिया का कारण बन सकती है। इसकी पहचान के लिए बच्चों की खानपान की आदतों पर नजर रखनी चाहिए।
असामान्य आदतें भी
एक विकृत बॉडी इमेज, समय पर खाना न खाना, खानपान की असामान्य आदतें (जैसे कि एक बार में सैकड़ो कैलोरी खा लेना अथवा कुछ भी नहीं खाना, बार-बार वजन देखना, अनिद्रा, कब्ज, त्वचा पर चकत्ते अथवा सूखापन, दांतों में कैविटी, दांतों के इनामल उतरना, बाल झडऩा और दिनभर अधिक व्यायाम करना।
इलाज में लापरवाही न करें
ईटिंग डिसॉर्डर लगे तो इसका इलाज करवाना चाहिए। इसमें वजन कम होने के साथ लड़कियों की माहवारी भी गड़बड़ा सकती है। आगे चलकर प्रजनन संबंधी समस्या हो सकती है।

Published on:
31 Aug 2018 10:47 am
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