scriptChildren of Mothers with Depression More Likely to Develop Depression | क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता है | Patrika News

क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता है

शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रीनैटल और पोस्टनैटल डिप्रेशन से उबारने के लिए पहले से ज्यादा प्रयासों की जरुरत है।

जयपुर

Published: August 28, 2020 02:05:56 pm

अमरीकी और ब्रिटिश शोधकर्ताओं का कहना है कि जो महिलाएं गर्भावस्था के दौरान और बाद में अवसाद का अनुभव करती हैं उनके बच्चों में भी बड़े होने पर अवसाद बढऩे की आशंका अधिक होती है। अध्ययन के परिणामों से संकेत मिलता है कि प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर अवसाद (Prenatal and Postnatal Depression) से निपटने के लिए चिकित्सकों को माताओं के इलाज के लिए अधिक प्रयास की जरुरत है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि एक स्वस्थ पारिवारिक माहौल और जीवनशैली ऐसे बच्चों में बड़े होने पर अवसाद के खतरे को कम कर सकती है। शोध के निष्कर्ष चिंताजनक इसलिए भी हैं क्योंकि जिन बच्चों की मांओं को प्रसवकालीन अवसाद का अनुभव हुआ था, उनमें दूसरे बच्चों की तुलना में किशोरावस्था और वयस्क होने पर अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता है। यह जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित एक नए अध्ययन का निष्कर्ष है।
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता है
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता है
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता हैलड़कियों में 6 फीसदी खतरा अधिक
अध्ययन में, यूनाइटेड किंगडम और उत्तरी अमरीका के शोधकर्ताओं ने करीब 16 हजार मातृ-शिशु जोड़ों से एकत्र आंकड़ों की जांच की। बच्चों की उम्र 12 वर्ष और उससे अधिक थी। इस अध्ययन में किशोरियों में उन किशोरों की तुलना में अवसाद का जोखिम 6 प्रतिशत अधिक पाया गयाए जिनकी मां को प्रसवकालीन अवसाद था। अध्ययन के नतीजे मांओं से बच्चों तक अवासद के पहुंचने की प्रक्रिया (Depression Risk Transmission) पर और अधिक शोध और अवसाद से उत्पन्न जोखिम में कमी के आकलन को कम करने में मदद कर सकते हैं। इससे चिकित्सक महिलाओं और बच्चों में गर्भावस्था के दौरान अवसादग्रस्तता विकारों के जोखिम को कम करते हैं।
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता हैक्या होता है प्रसवकालीन अवसाद
मनोवैज्ञानिक और मानसिक बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रोजीन कैपन्ना-हॉज का कहना है कि प्रसवकालीन अवसाद (Perinatal Depression) के बारे में इतना ही जान लेना काफी नहीं है, अब भी बहुत से रहस्यों से पर्दा उठना बाकी है। प्रसवकालीन अवसाद गर्भावस्था के दौरान अवसादग्रस्तता (Antenatal Depression) या गर्भावस्था के बाद के 12 महीनों के भीतर होने वाले प्रसवोत्तर अवसाद (Postnatal Depression) के बारे में चेताता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के अनुसार यह मनोदशा विकार हल्के से लेकर गंभीर तक और उपचार योग्य भी हो सकती है। डॉ. रोजीन ने बताया कि हम प्रसव पूर्व और प्रसव के दौरान यही उम्मीद करते हैं कि बच्चा स्वस्थ होगा लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद 60 से 80 प्रतिशत महिलाएं जिन्होंने हाल ही बच्चे को जन्म दिया है उनमें प्रसवोत्तर अवसाद की बहुत ज्यादा आंशका होती है। जबकि 10 से 20 फीसदी माताओं में क्लिनिकल पोस्टपार्टम डिप्रेशन (मानसिक विकार) हो सकता है। परेशानी यह है कि ज्यादातर महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अवसाद के इन लक्षणों को पहचान ही नहीं पातीं। कुछ महिलाओंमें प्रसव के बाद उस बच्चे के लिए उदासी और दुख से वे ,खुद को दोषी महसूस करती हें जबकि वे खुद इस बच्चे के लिए बहुत ज्यादा डेस्पेरेट (Desperate) थीं।
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता हैशोध के निष्कर्ष पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ
विशेषज्ञों को शोध के निष्कर्ष पर कोई हैरानी नहीं हुई। डॉ. एलेक्जेंड्रा स्टॉकवेल का कहना है कि हमारी संस्कृति मातृत्व को भावनात्मक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से उसे सराहने से बचती है और यही भावना मां बनने पर महिलाओं को जिम्मेदारी के बोझ जैसा लगने लगता है। हम अब भी मां के महत्व को नहीं समझते हैं, इससे मां और बच्चे दोनों के लिए चुनौतियां पैदा होती हैं। मां का प्रसवकालीन अवसाद उसके पोषण के प्रभाव के रूप में कार्य करता है। मनुष्यों सहित सभी स्तनधारी, नकल के माध्यम से सीखते हैं। हमारे बच्चों ने माता-पिता से सभी प्रकार की चीजें सीखीं। सीखने की यह प्रक्रिया बहुत कम उम्र में ही शुरू हो जाती हैं। इनमें से कुछ को हम समझ पाते हैं और कुछ बातों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। मां का प्रसवकालीन और प्रसवोत्तर अवसाद भी ऐसा ही है जो बच्चों पर बहुत कम उम्र से प्रभाव डालने लगता है, भले से फिर अवसाद या किसी मानसिक विकार की परिवार में पहले से कोई हिस्ट्री न रही हो। डॉ. रोजीन का कहना है कि अध्ययन ने साबित किया है कि मां की अंत:क्रियाओं का बच्चों पर गहरा असर पड़ता है, यह भी कि एक मां अपने बच्चे की प्रतिक्रियाओं के प्रति कितनी संवेदनशील होती है। इसका मस्तिष्क स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। विशेष रूप से, अनुसंधान ने यह दिखाया है कि जब शिशु अपनी अवसादग्रस्त मां के साथ जुडऩे की कोशिश करते हैं तो वे उदासीन और सपाट प्रति्िरकया देती हैं जिससे शिशु के साथ उनका सहसंबंध नहीं जुड़ पाता और यही प्रतिक्रिया बच्चे में मानसिक विकार या अवसाद का कारण बनती है। मां का अवसाद शिशु के भावनात्मक विकास को बाधित करता है।
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता हैऐसे कम कर सकते हैं जोखिम को
आस-पास के जैविक और पर्यावरणीय कारक हमारे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं, विशेष रूप से गर्भावस्था और प्रसव से संबंधित शारीरिक परिवर्तनों के दौरान। प्रसवकालीन अवसाद और बाल विकास में प्रशिक्षित एक चिकित्सक की सेवाएं ले सकते हैंं जो माता-पिता को प्रशिक्षित कर सकता है। विशेषज्ञों ने बताया कि आमतौर पर वयस्कों में अवसाद के जोखिम को कम करने के लिए वही उपाय लागू किए जा सकते हैं जो मातृत्व अवसाद के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। इसका मतलब है पर्याप्त नींद, पूरा पोषण, गतिविधि, हाइड्रेटेड रहना, प्रकृति के बीच समय बिताना और जरूरत पडऩे पर मदद के लिए सहकर्मी या पेशेवर का मौजूद होना बहुत अंतर ला सकता है। और भी उपाय हैं जिन्हें अपनाया जा सकता है।
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता हैप्रसव संबंधी जोखिम से ऐसे रहें दूर
गर्भावस्था के दौरान अवसाद के लक्षणों की स्क्रीनिंग के लिए महिलाएं अपने माता-पिता और वयस्कों से मानसिक स्वास्थ्य विकारों के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त करें और उसके आधार पर अपने व्यक्तिगत जोखिम कारकों को पहचानें। परिवार के सदस्यों से बात करें और मूड और चिंता होने जैसे सामान्य अवसाद के विकारों पर विशेष ध्यान दें। इसी प्रकार प्रसवोत्तर अवसाद के इलाज के लिए मनोचिकित्सा और दवाओं का पूरा ध्यान रखें। नई मां को घर में पूरा सपोर्ट मिले और उसकी देखभाल और खाने-पीने का पूरा ध्यान रखा जाए। क्योंकि जब मां का खयाल रखा जाएगा तो मां की अपने शिशु की देखभाल करने की क्षमता में वृद्धि होती है।
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता हैबच्चों में अवसाद के लक्षणों को यूं पहचानें
दरअसल अवसाद के संकेतों को जान लेने से जोखिम कम हो जाता है। उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर अवसाद हमेशा एक ही तरह से प्रकट नहीं होता है। हर उम्र में यह अलग तरह से सामने आता है। बच्चों की भावनाएं और व्यवहर उनके अवसाद संबंधी लक्षणों के बारे में काफी कुछ बताते हैं। हाल के शोधों से पता चला है कि अवसाद के शुरुआती लक्षणों की पहचान कर उन्हें दूर करने से युवाओं और वयस्कों की आत्महत्या के जोखिम को कम करने में मदद की जा सकती है। विशेषज्ञों ने उम्र के हिसाब से डिप्रेशन के निम्नलिखित लक्षण बताए हैं-
नवजात और शुरुआती शिशुकाल (उम्र-0 से 5 वर्ष)
-अनिद्रा की परेशानी, भूख न लगना और कम गतिविधि और लंबे समय तक उदासी या चिड़चिड़ापन
बालपन
-अपराधबोध, आत्म-सम्मान में कमी और आत्म-अभिव्यक्ति का अभाव
-शारीरिक परेशानियां जैसे सिरदर्द, पेट में दर्द या बीमार महसूस करना, बात-बात में नखरे या अन्य व्यवहार संबंधी समस्याएं
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता हैकिशोरावस्था
-वयस्क होने के बावजूद वयस्कोंमें न घुलना-मिलना, लेकिन करीबी दोस्तों के साथ समय बिताना
-किशोरावस्था में चिड़चिड़ापन या क्रोध के माध्यम से व्यक्त भावनात्मक परिवर्तन, उदास रहना या मूड स्विंग होना
-खराब नींद की शिकायत करना, सीमित नींद और अलग-अलग समय पर सोना
वयस्क
-भावनाओं को आमतौर पर उदासी और स्विंग मूड के साथ प्रदर्शित करे
-नींद की कमी और चिड़चिड़ापन
-अलगाव और दूसरों से दूरी बनाए रखना
-व्यवहार में चिंता या घबराहट दिखे तो मनोचिकित्सक से मिलें
क्या आप जानते हैं: अवसादग्रस्त मांओं के बच्चों में अवसाद बढऩे का खतरा 70 प्रतिशत अधिक होता है

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