सोनभद्र के आदिवासी बाहुल्य पूर्वी इलाकों मे फ्लोरोसिस का कहर अपाहिजों की बस्ती तैयार कर रहा है ,यहाँ के पड़वा-कोदवारी ,पिपरहवा ,कथौदी ,कुस्मुहा ,रास्पहरी,भटवारी ,राजो,नेमा ,राज मिलन ,बिछियारी समेत 2दर्जन गावों मे हिंडालको व एन.टी,पी.सी से निकलने वाले प्रदूषित जल का भयावह असर देखने को मिल रहा है ,आलम ये है कि लगभग 100 परिवारों के टोले पडवा-कोद्वारी मे हर एक स्त्री -पुरूष व बच्चे को फ्लोराइड रूपी विष रोज बरोज मौत की और धकेल रहा है ,केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा विगत पाँच वर्षों में इस समूचे छेत्र मे फ्लोराइड मेनेजमेंट के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद न तो ओद्योगिक प्रदूषण पर लगाम लगाई जा सकी और न ही स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को लेकर कोई कवायद की गई। इस वर्ष भी अप्रैल माह मे कहने को तो फ्लोराइड मुक्त जल की व्यवस्था के नाम पर ५० लाख रुपए खर्च किए जाने का प्रशासन दावा करता रहा ,परन्तु जमीनी हकीकत ये है कि कुछ भी नही बदला |हाँ,ये जरुर है कि इन इलाकों के सैकडों ,तालाबों व कुओं पर लाल रंग का निशान लगाकर लोगों को पानी न पीने देने की चेतावनी देने का थोथा प्रयास जुरूर किया गया,मगर जबरदस्त पेयजल संकट से जूझ रहे इस जनपद मे नौकरशाही से थकहार चुके आदिवासियों ने अन्य कोई समानांतर व्यवस्था के अभाव मी प्रदूषित जल का सेवन जारी रखा। कहा जा सकता है की इस गंभीर रोग के साथ साथ मौत को भी अनवरत गले लगाया जा रहा है तमाम टोलों मी स्थिति इस हद तक गंभीर है की हर एक परिवार के सारे लोग फ्लुरोसिस की अन्तिम अवस्था से जूझ रहे हैं कोद्वारी के रामप्रताप का सरीर इस कदर अकडा की वो चारपाई से कभी उठ नही पाते ,वहीं उनकी पत्नी व लड़का भी इस भयावह रोग की चपेट मे आकर रोज बरोज मर रहे हैं।