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यहां बच्चों को जन्म देने से डरती है माताएं 

-फ्लोरोसिस के जहर से यूपी के सोनभद्र जिले के दर्जनों गाँव हो गए विकलांग, सरकार खामोश 

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Awesh Tiwary

Apr 05, 2016

fluorosis in sonbhadra

fluorosis in sonbhadra

-आवेश तिवारी
वाराणसी- सोनभद्र सदमे मे है ,अभाव,उपेक्षा और सरकारी अक्षमता की बानगी बन चुके इस जनपद मे शासन एवं सत्ता, एक भयावह काली हकीकत पर परदा डालकर समूची पीढ़ी को विकलांग,नपुंसक और नेस्तनाबूद करने जा रही है। उत्तर प्रदेश की उर्जा राजधानी कहे जाने वाले सोनभद्र के चोपन ,दुद्धी व म्योरपुर ब्लाक के एक दर्जन गाँवों मे फ्लोराइड प्रदूषित जल के चपेट मे आकर हजारों आदिवासी स्त्री पुरूष व बच्चे स्थायी विकलांगता के शिकार हो रहे हैं ,माताओं की कोख सुनी पड़ी है ,वहीं तमाम जिंदगियों मे छाया अँधेरा अनवरत गहराता जा रहा है। राज्य पोषित विकलांगता का हाल ये है कि तमाम योजनाओं मे करोड़ों रुपए खर्च किया जाने के बावजूद यहाँ के आदिवासी गिरिजनों के हिस्से मे एक बूँद भी स्वच्छ पानी मयस्सर नही है फ्लोराइड रूपी जहर न सिर्फ़ इनकी नसों मे घूल रहा है ,बल्कि निर्बल व निरीह आदिवासियों के सामाजिक -आर्थिक ढाँचे को भी छिन्न-भिन्न कर रहा है। पिछले दिनों जब पीएम मोदी बनारस में विकलांगों को ट्राईसाइकिल वितरित करने आये तब केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री ताराचंद गहलोत ने इन फ्लोरोसिस प्रभावित आदिवासियों को मदद पहुंचाने का वादा किया, मगर हकीकत की जमीन पर कुछ भी नहीं किया गया।
यहाँ रोज होता है मौत का इन्तजार
सोनभद्र के आदिवासी बाहुल्य पूर्वी इलाकों मे फ्लोरोसिस का कहर अपाहिजों की बस्ती तैयार कर रहा है ,यहाँ के पड़वा-कोदवारी ,पिपरहवा ,कथौदी ,कुस्मुहा ,रास्पहरी,भटवारी ,राजो,नेमा ,राज मिलन ,बिछियारी समेत 2दर्जन गावों मे हिंडालको व एन.टी,पी.सी से निकलने वाले प्रदूषित जल का भयावह असर देखने को मिल रहा है ,आलम ये है कि लगभग 100 परिवारों के टोले पडवा-कोद्वारी मे हर एक स्त्री -पुरूष व बच्चे को फ्लोराइड रूपी विष रोज बरोज मौत की और धकेल रहा है ,केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा विगत पाँच वर्षों में इस समूचे छेत्र मे फ्लोराइड मेनेजमेंट के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद न तो ओद्योगिक प्रदूषण पर लगाम लगाई जा सकी और न ही स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को लेकर कोई कवायद की गई। इस वर्ष भी अप्रैल माह मे कहने को तो फ्लोराइड मुक्त जल की व्यवस्था के नाम पर ५० लाख रुपए खर्च किए जाने का प्रशासन दावा करता रहा ,परन्तु जमीनी हकीकत ये है कि कुछ भी नही बदला |हाँ,ये जरुर है कि इन इलाकों के सैकडों ,तालाबों व कुओं पर लाल रंग का निशान लगाकर लोगों को पानी न पीने देने की चेतावनी देने का थोथा प्रयास जुरूर किया गया,मगर जबरदस्त पेयजल संकट से जूझ रहे इस जनपद मे नौकरशाही से थकहार चुके आदिवासियों ने अन्य कोई समानांतर व्यवस्था के अभाव मी प्रदूषित जल का सेवन जारी रखा। कहा जा सकता है की इस गंभीर रोग के साथ साथ मौत को भी अनवरत गले लगाया जा रहा है तमाम टोलों मी स्थिति इस हद तक गंभीर है की हर एक परिवार के सारे लोग फ्लुरोसिस की अन्तिम अवस्था से जूझ रहे हैं कोद्वारी के रामप्रताप का सरीर इस कदर अकडा की वो चारपाई से कभी उठ नही पाते ,वहीं उनकी पत्नी व लड़का भी इस भयावह रोग की चपेट मे आकर रोज बरोज मर रहे हैं।
नहीं बजती शहनाइयाँ ,गर्भ में ही दम तोड़ देते हैं बच्चे
कमोवेश यही हाल अन्य परिवारों का है |बच्चों मे जहाँ फ्लोराइड की वजह से विषम अपंगता,व आंशिकरुग्णता देखने को मिल रहा है ,वहीं गांव के विवाहितों ने अपनी प्रजनन व कामशक्ति खो दी है। गांव के रामनरेश,कैलाश आदि बताते हैं की अब कोई भी अपने लड़के लड़कियों की शादी हमरे गांव मे नही करना चाहता ,देखियेगा एक दिन हमरे गांव टोलों का नामो,निशाँ मिट जाएगा। महिलाओं मे फ्लोराइड का विष कहर बरपा रहा है ,इलाके मे गर्भस्थ शिशुओं के मौत के मामले सामने आ रहे हैं ,स्त्रियाँ मातृत्व सुख से वंचित हैं,वहीं घेंघा ,गर्भाशय के कैंसर समेत अन्य रोगों का भी शिकार हो रहे हैं। लगभग 80 फीसदी औरतों ने शरीर के सुन्न हो जाने की शिकायत की है। नई बस्ती की लीलावती,शांति,संतरा इत्यादी महिलाएं कहती हैं कि हम बच्चे पैदा करने से डरते हैं हमें लगता हैं की वो भी कहीं इस रोग का शिकार न हो जाए ,फ्लुओरोसिस ने आदिवासी-किसानों को पूरी तरह से तबाह कर डाला है ।अपंगता की वजह से स्त्री पुरूष काम पर नही जा पाते हाजरों हेक्टेयर परती भूमि कौडी के भाव बेची जा रही है ,नक्सल प्रभावित इन गांव मे अब तक प्राथमिक चिकित्सा की भी सुविधा उपलब्ध नही है। पीडितों के लिए स्वास्थ्य विभाग द्बारा एक टेबलेट भी मुहैया नही करायी गई |पिपरहवा के रामधन कहते हैं कि अब हमें कुछ नही चाहिए हमने मरना सीख लिया है।

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