मानव निर्मित इंजीनियर्ड वायरस कोरोना से लडऩे में सक्षम, चूहों पर प्रयोग सफल

वहीं कोरोनावायरस को रोकने में वैज्ञानिकों की जीनएडिटिंग तकनीक क्रिस्पर पर भी उम्मीद टिकी हुई है

By: Mohmad Imran

Published: 16 Aug 2020, 04:38 PM IST

अमरीकन सोसायटी ऑफ माइक्रोबायोलॉजी की मैगजीन एमबायो में हाल ही एक शोध प्रकाशित हुआ है। लेख में शोधकर्ताओं की एक टीम ने कोरोना के मर्स वायरस के खिलाफ एक कारगर वैक्सीन का वर्णन किया है। मर्स (Middle East Respiratory Syndrome) का प्रकोप 2012 में शुरू हुआ था जिसमें 850 से अधिक लोग मारे गए थे। अध्ययनों से पता चला है कि कोरोना वायरस से होने वाली मौतों की दर 30 से 35 फीसदी है। नए शोध में वैज्ञानिकों का सुझाव है कि उन्होंने मर्स वायरस वैक्सीन के लिए जो तरीका अपनाया, वह कोविड-19 वायरस (covid-19) के खिलाफ भी काम कर सकता है। वैक्सीन बनाने की विधि एक आरएनए वायरस (RNA VIRUS) है जिसे पैराइन्फ्लुएंजा वायरस 5 या पीआइवी-5 कहा जाता है।

मानव निर्मित इंजीनियर्ड वायरस कोरोना से लडऩे में सक्षम, चूहों पर प्रयोग सफल

चूहों पर सफल रहा प्रयोग
शोध के प्रमुख वैज्ञानिक आयोवा विश्वविद्यालय में एमडीए पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजिस्ट और कोरोनावायरस विशेषज्ञ पॉल मैक्रे टीके का परीक्षण करने के लिए एक माउस मॉडल विकसित किया जो कोरोना वायरस मर्स के संक्रमण की नकल करता है। चूहों ने आनुवंशिक रूप से डीपीपी प्रोटीन जिसका इस्तेमाल मर्स वायरस मानव कोशिकाओं में प्रवेशकरने के लिए करता है को व्यक्त करने के लिए इंजीनियर किया गया था। लैब परीक्षणों से पता चला कि टीके की एक खुराक इंट्रानैसली प्रभावी रूप से संक्रमित कोशिकाओं के कारण एस प्रोटीन का उत्पादन करती है जिसके कारण चूहों में प्रोटीन के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरू हो गई। जिन चूहों में पीआइवी-५ की मदद से इंजीनियर्ड प्रतिरक्षित वायरस बनाया गया था वे सभी चूहे वायरस के संक्रमण से बच गए। वायरस के इंट्रामस्क्युलर वैक्सीन ने केवल घातक संक्रमण से 25 फीसदी चूहों की रक्षा की। पॉल मैक्रे के अनुसार उनका अध्ययन बताता है कि चूहों में मर्स वायरस के खिलाफ एक इंट्रानैसल पीआइवी-५ आधारित वैक्सीन प्रभावी है। उन्होंने कहा कि नोवेल कोरोनावायरस सहित अन्य खतरनाक कोरोना वायरस के खिलाफ इस वैक्सीन की क्षमता की जांच की जानी चाहिए।

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जीनएडिटिंग तकनीक से भी उम्मीद
नोवेल कोरोना वायरस कोविड-19 का टीका अथवा संभावित दवा बनाने के लिए वैज्ञानिकों की निगाहें अत्याधुनिक जीन एकडिटिंग तकनीक क्रिस्पर भी टिकी हुई है। इस तकनीक का उपयोग कर साल 2018 में चीन के एक जीन विज्ञानी ने अपनी बेटी के अनुवांशिक रोगको दूर करने में सफलता पाई थी। क्रिस्पर तकनीक से शरीर के जीन की एडिटिंग कर वैज्ञानिक एचआईवी और फ्लू जैसे खरतनाक संक्रमणों के खिलाफ हमें स्थायी सुरक्षा देने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को रि-डिजायन करने में कामयाब हो गए हैं। चूहों पर प्रयोगशाला में किए कुछ परीक्षणों से पता चलता है कि इस तकनीक का उपयोग लोगों को वायरस के उन विशेष वर्ग से सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत किया जा सकता है जिनके लिए अभी तक कोई प्रभावी टीके उपलब्ध नहीं हैं।

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एंटीबॉडी प्रोटीन का होता स्राव
वॉशिंगटन के सिएटल में फ्रेड हचिंसन कैंसर रिसर्च सेंटर में जस्टिन टेलर और उनके सहयोगियों ने बी-कोशिकाओं नामक सफेद रक्त कोशिकाओं पर क्रिस्पर (CRISPR) तकनीक का इस्तेमाल किया। ये हमारी प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं और विशेष रूप से बैक्टीरिया पर हमला करने वाले एंटीबॉडी प्रोटीन का स्राव करते हैं। उनकी टीम ने तथाकथित बी कोशिकाओं के डीएनए को संपादित करके कृत्रिम रूप से उन्नत और लंबे समय तक चलने वाले एंटीबॉडी बनाने के लिए एक नई तकनीक विकसित की है। हालांकि अभी वैज्ञानिकों को यह साबित करना होगा कि तकनीक सुरक्षित है और इसमें कई साल लगेंगे। लेकिन अगर यह इंसानों के लिए सुरक्षित साबित होती है तो भविष्य में अस्पताल का दौरा, विकलांगता और हर साल होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। बी कोशिकाएं एंटीबॉडी का उत्पादन करती हैं जो हमें खतरनाक रोगजनकों से बचाती हैं।

Mohmad Imran
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