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गोंद से जुड़ेंगी हड्डी, भरेंगे घाव, अब कम समय में ठीक होंगे मरीज

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइआइएसइआर) भोपाल के शोधकर्ताओं ने दो साल में ऐसा बायोमेडिकल गोंद तैयार किया है, जो चोटिल अंग और घाव भरने से लेकर हड्डी जोड़ने में सक्षम है।

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IISEER Bhopal develops biomedical glue that can heal wounds

IISEER Bhopal develops biomedical glue that can heal wounds, repair tissues and join bones

भोपाल. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइआइएसइआर) भोपाल के शोधकर्ताओं ने दो साल में ऐसा बायोमेडिकल गोंद तैयार किया है, जो चोटिल अंग और घाव भरने से लेकर हड्डी जोड़ने में सक्षम है।

ये टिश्यू भी तेजी से रिपेयर करता है, इससे कम समय में मरीज ठीक होगा। यह दिखने में पारदर्शी है और शरीर के लिए सुरक्षित भी। सूखी और गीली दोनों फॉर्म में काम करता है। उनका यह शोध केमिस्ट्री ए यूरोपियन जर्नल में प्रकाशित किया गया है। आइआइएसइआर के प्रोफेसर आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि इसके कोई साइड इफेक्ट्स नहीं है। यह खुद समय के साथ घुल जाता है।

न साइड इफेक्ट होगा और न हवा-पानी से बचाने की जरूरत होगी

इसके लिए किसी अतिरिक्त एजेंट या धातु की आवश्यकता नहीं है। अब तक इस गोंद का प्रयोग शरीर के बाहर किया है। अगले चरण में इसका प्रयोग जानवरों पर किया जाएगा, जिसमें घाव, नसों में छेद, टूटी हड्डी और टिश्यू पर लगाया जाएगा। इसके बाद मानव शरीर पर प्रयोग किया जाएगा।

विदेश में चल रहे इस तरह के प्रयोग

बायोमेडिकल पदार्थ को बनाने की प्रेरणा मसल्स नामक जलीय जीव से मिली, जो इसी तरह का चिपचिपा पदार्थ बनाता है। इससे वह चट्टानों व अन्य जीवों से चिपका रह सकता है।

श्रीवास्तव के अनुसार ऐसे पदार्थों का उपयोग विदेश में किया जा रहा है। इनका इस्तेमाल चिकित्सा और टिश्यू इंजीनियरिंग में हो रहा है, लेकिन अब तक उपयोग हो रहे पदार्थ फाइब्रिन, कोलेजन, जिलेटिन और चिटोसन जैसे प्राकृतिक पॉलिमर होते हैं। इनसे शरीर के भीतर होने वाली जैविक प्रक्रियाओं के ट्रिगर होने का जोखिम रहता है। ऐसे में आइआइएसइआर भोपाल का गोंद सुरक्षित और बेहतर विकल्प साबित होगा।

शशांक अवस्थी

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