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कोरोना ने घर बैठे ही बढ़ाया लोगों का वजन और तनाव

दरअसल वर्क फ्रॉम होम के कारण लोगों की जीवनशैली और खानपान में आए बदलाव के कारण बीते चार महीने में वजन बढऩा, तनाव, थकान, मोटापा और अनिद्रा की परेशानी आम समस्या बनकर उभरी हैं। शोध भी इसे मानते हैं।

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जयपुर

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Mohmad Imran

Jun 26, 2020

कोरोना ने घर बैठे ही बढ़ाया लोगों का वजन और तनाव

कोरोना ने घर बैठे ही बढ़ाया लोगों का वजन और तनाव

कोरोना महामारी के संक्रमण के अलावा भी जीवनशैली पर अन्य कई बातों का भी असर पड़ा है। सबसे ज्यादा फर्क लॉकडाउन की वजह से वर्कफ्रॉम होम ने डाला है। घर से काम करने की सुविधा ने जहां लोगों को आराम पसंद बनाया है वहीं खान-पान की बिगड़ी हुई आदतों ने बढ़ा हुआ पेट और वजन भी हमारे हिस्से में जोड़ दिया है। हाल ही हुए बहुत से शोध इस बात की तस्दीक करते हैं कि वर्क फ्रॉम के दौरान लोगों में वजन बढऩा, तनाव, थकान, मोटापा और अनिद्रा की परेशानी आम समस्या बनकर उभरी हैं।

खाने की खराब आदत बनी वजह
शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्क फ्रॉम होम कल्चर से अब तक कुछ ही क्षेत्र वाकिफ थे जहां प्राकृतिक आपदा और अन्य कारणों से अक्सर लोग वर्क फ्रॉम होम कल्चर को फॉलो करते हैं। मुम्बईमें बारिश के मौसम में जब ट्रेनें और लोकल ट्रांसपोर्ट ठप हो जाता है तो ऑफिस का काम घर से करने का ट्रेंड बीते कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है। अब घर पर काम करने के दौरान खाने-पीने की आदतों पर किसका कंट्रोल रहता है। एक सर्वे में सामने आया कि लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम हो मके दौरान फास्ट फूड, चॉकलेट, चिप्स और बेकरी उत्पादों के अलावा घर का बना तला-बुना खाना वजन बढऩे और मोटापे के लिए जिम्मेदार हैं। एक-तिहाई लोगों ने यह भी कहा कि वे इस दौरान सामान्य दिनों से ज्यादा चाय, कॉफी, कोल्डड्रिंक और जूस पीने लगे हैं। ज्यादातर ने माना कि इसका एक बड़ा कारण वर्क फ्रॉम होम कल्चर में शारीरिक सक्रियता घटने और देर तक बैठकर काम करना है। व्यायाम से दूरी ने भी इसमें इजाफा किया है।

3 गुना बढ़ गया है तनाव
ब्रिटेन में हुए एक शोध में कहा गया है कि लॉकडाउन के बाद बच्चों की मानसिक सेहत पर दूरगामी असर पड़ सकता है। बाथ यूनिवर्सिटी में बच्चों और नौजवानों की मानसिक सेहत पर अकेलेपन के असर के बारे में एक अध्ययन किया गया जिसका निष्कर्ष था कि आने वाले वर्षों में लोगों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की ज़्यादा ज़रूरत पड़ सकती है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि बच्चों और किशोरों में इस दौरान डिप्रेशन और चिंता जैसी समस्याएं उभर सकती हैं। शोध के अनुसार युवाओं में डिप्रेशन का खतरा पहले की तुलना में तीन गुना बढ़ गया है और अकेलेपन का प्रभाव और डिप्रेशन का असर कम-से-कम नौ साल तक रह सकता है। वहीं घर से काम कर रहे लोगों ने लॉकडाउन के दौरान मन में खुद की नकारात्मक छवि बनने की बात कही। 50 फीसदी से अधिक महिलाओं ने बेचैनी की शिकायत की। वहीिं एक तिहिाई की नींद इस दौरान हुए अकेलेपन के एहसास के चलते उड़ गई है।