
इस रोग के मामले बेहद कम सामने आते हैं लेकिन उन्हें भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
पॉलिसिस्टिक किडनी डिजीज (पीकेडी)एक आनुवांशिक रोग है। इसमें किडनी में कई गांठें बनने लगती हैं। ये कैंसर की नहीं होती। हर व्यक्ति के किडनी का आकार व प्रकार अलग होने के कारण ये गांठें भी अलग आकार की बनती हैं। इसे ऑटोसोमल पॉलिसिस्टिक किडनी डिजीज भी कहते हैं। इस रोग के मामले बेहद कम सामने आते हैं लेकिन उन्हें भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि लापरवाही से कई बार ये गांठें कैंसर का रूप भी ले लेती हैं।
दो तरह की दिक्कत
पीकेडी दो तरह की है। ऑटोसोमल डोमिनेंट और ऑटोसोमल रिसेसिव। इनमें से ऑटोसोमल डोमिनेंट के मामले सबसे ज्यादा हैं जो पीढिय़ों में चलते हैं। ऐसे में जिस भी व्यक्ति के घर में यह रोग पहले से है उसे परिजन की जरूरी जांचें करवानी चाहिए। इसके अलावा बच्चों में खासतौर पर होने वाली ऑटोसोमल रिसेसिव पॉलिसिस्टिक डिजीज के मामले दुर्लभ होते हैं। जिसका मुख्य कारण जीन्स में बदलाव होना है। इससे पीडि़त बच्चों का जीवनकाल लंबा नहीं रह पाता है।
लक्षण पहचानें
इन गांठों का आकार धीरे-धीरे बढ़ता है। किडनी के कमजोर होने से इसका काम प्रभावित होता है व अंत में क्रिएटिनिन लेवल बढऩे से किडनी संबंधी अन्य रोग होते हैं। ये गांठें साइलेंट भी पड़ी रहती हैं और कई बार इनसे पेट के दोनों तरफ हल्का या तेज दर्द होता है। इन गांठों पर ध्यान न देने से ये कैंसर की गांठ में तब्दील हो सकती हैं।
सतर्कता बरतें
इस गांठ का पता लगने पर इसे मॉनिटर करते हैं। कई बार इन गांठों में पथरी बनने से तकलीफ बढ़ती है। किसी कारण से यदि ये टूट या फूट जाएं तो पेशाब में खून आ सकता है। इनमें संक्रमण भी हो सकता है। ज्यादातर मामलों में ३० साल की उम्र के बाद ही व्यक्ति रोग से प्रभावित होता है। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ये गांठें जल्दी उभरती है।
इलाज
संक्रमण होने पर एंटीबायोटिक्स देते हैं। गांठों की संख्या बढऩे से यदि किडनी का आकार काफी बढ़ जाए, मरीज सांस न ले पाए या गांठ कैंसर या ट्यूमर में तब्दील हो जाए तो किडनी निकाल देते हैं। इसके अलावा इन गांठों से कई बार किडनी ज्यादा कमजोर हो जाती है, जिसके लिए रोगी को नियमित डायलिसिस या ट्रांसप्लांट करवाने की जरूरत पड़ सकती है।
Published on:
02 Oct 2017 05:04 pm
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