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मेनिनजाइटिस : संक्रमण के तीसरे दिन से त्वचा पर उभरते छोटे दाने, इसके बारे में विस्तार से

मेनिनजाइटिस (दिमागी बुखार) खासतौर पर बच्चों (नवजात से किशोरावस्था) को होता है लेकिन इसके मामले बुजुर्ग व युवाओं में भी मिलते हैं।

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Vikas Gupta

Oct 02, 2017

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मेनिनजाइटिस (दिमागी बुखार) खासतौर पर बच्चों (नवजात से किशोरावस्था) को होता है लेकिन इसके मामले बुजुर्ग व युवाओं में भी मिलते हैं।

बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ आदि से होने वाला संक्रमण जब दिमाग व रीढ़ की हड्डी की बाहरी झिल्ली को संक्रमित करता है तो मेनिनजाइटिस का कारण बनता है। कह सकते हैं कि शरीर का बुखार जब दिमाग पर असर करे तो यह रोग होता है। मेनिनजाइटिस (दिमागी बुखार) खासतौर पर बच्चों (नवजात से किशोरावस्था) को होता है लेकिन इसके मामले बुजुर्ग व युवाओं में भी मिलते हैं। बुजुर्गों में लक्षण बच्चों जैसे ही हैं फर्क इतना है कि उनमें समस्या की शुरुआत सिरदर्द और गर्दन में अकडऩ व दर्द से होती है। इसलिए इसे गर्दन का बुखार भी कहते हैं। इससे गर्दन का मूवमेंट मुश्किल हो जाता है।

लक्षण : शुरुआती लक्षण तेज बुखार (103-104 डिग्री फारेनहाइट) व त्वचा पर छोटे दाने उभरना है। स्वभाव में बदलाव,ब्लड प्रेशर का लो होना, रीढ़ की हड्डी में दर्द, भोजन न करना, चेहरे पर नीले रंग के चकत्ते या दाग, पहचानने व सुनने की क्षमता में कमी, दौरे आना व गंभीर स्थिति में रोगी कोमा में जा सकता है। इसके लक्षण संक्रमण होने के तीसरे या चौथे दिन से उभरते है। कई बार इलाज में देरी से सुनने की क्षमता खत्म हो जाती है और रोगी को लकवे का अटैक भी आ सकता है।

डीपीटी, हिब व हेपेटाइटिस-बी को मिलाकर तैयार पेंटावेलेंट वैक्सीन शिशु को हर डेढ़, ढाई व साढ़े ३ माह पर लगते हैं। ये बड़े-बुजुर्ग को भी लगता। 20-30 फीसदी तक बढ़ जाती है मृत्यु दर देरी से इलाज लेने की स्थिति में। ऐसा बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी में हो सकता है।

इलाज : ब्लड टैस्ट, सीटी स्कैन, कल्चर टैस्ट, एमआरआई से संक्रमण की पहचान करते हैं। शुरुआत के कुछ दिन पानी की गीली पट्टी सिर, हाथ-पैरों और गर्दन पर रखने की सलाह देते हैं। लक्षणों के अनुसार दवाएं देते हैं। बुखार यदि सामान्य है तो एंटीबायोटिक्स और तेज है तो कैन्युआ के जरिए दवा दी जाती है।

प्रमुख कारण - बैक्टीरिया, वायरस, घर के आसपास यदि कोई रोग फैला है तो उसके बैक्टीरिया से भी यह फैल सकता है। बदबूदार कमरे में एकसाथ रहना, सफाई की कमी, जहां पर्याप्त सूर्य की किरणें न आती हों, अधिक उम्र, प्रेग्नेंसी, एचआईवी, हेपेटाइटिस आदि रोगों में कमजोर हुई इम्युनिटी की वजह से यह हो सकता है।

बचाव ऐसे करें - आयुर्वेद : सन्नीपा ज्वर कहते हैं। इसमें पाचन प्रणाली व पेट की अग्नि भोजन पचा नहीं पाती। इससे विषैले तत्त्व दिमाग तक पहुंचकर बुखार लाते हैं। ऐसे में भूखे रहने से पेट की अग्नि बचे हुए खाने को पचाकर विषैले तत्त्व बाहर निकालती है। दूध न पीने व कम खाने की सलाह देते हैं। तुलसी पत्तों के रस में मरीच का १-२ चुटकी पाउडर मिलाकर दो चम्मच दिन में २-३ बार देते हैं। गिलोय रस आधी चम्मच दिन में ३ बार देते हैं।
होम्योपैथी: वायरल इंफेक्शन में दवा देते हैं। बैक्टीरियल इंफेक्शन दिमाग को डैमेज करता है। लक्षण-उम्र के अनुसार दवा की पोटेंसी तय करते है। यदि स्थिति गंभीर है तो मरीज को अस्पताल में भर्ती करवाकर इलाज करवाना उचित रहता है।