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Harish Rana Case: हरीश राणा के लिए AIIMS ने शुरू की इच्छामृत्यु की प्रक्रिया, जानें कितना लगता है समय

Passive Euthanasia क्या है? हरीश राणा केस में AIIMS ने शुरू की प्रक्रिया। जानिए भारत में इच्छामृत्यु का कानून, Supreme Court का फैसला और पूरा मामला आसान भाषा में।

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भारत

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Dimple Yadav

Mar 17, 2026

Harish Rana Case

Harish Rana Case (Photo- instagram)

Harish Rana Case: हाल ही में Supreme Court of India के एक अहम फैसले के बाद देश में पहली बार एक खास मामला चर्चा में है। 31 साल के हरीश राणा, जो पिछले 13 सालों से कोमा में हैं, उनके लिए दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences ने passive euthanasia यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शुरू कर दी है। खबरों के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में करीब 2-3 हफ्ते का समय लग सकता है।

Passive euthanasia क्या होता है?

आसान भाषा में समझें तो passive euthanasia का मतलब है कि मरीज को दी जा रही life support (जैसे ऑक्सीजन, ट्यूब से खाना, या अन्य मशीनों की मदद) को धीरे-धीरे बंद कर दिया जाता है, ताकि मरीज प्राकृतिक तरीके से दुनिया को अलविदा कह सके। इसमें किसी तरह की दवा देकर जान नहीं ली जाती, जैसा कि active euthanasia में होता है। भारत में passive euthanasia को कानूनी मंजूरी 2018 में Supreme Court of India के ऐतिहासिक फैसले के बाद मिली थी। इस फैसले में living will यानी पहले से लिखी गई इच्छा को भी मान्यता दी गई।

AIIMS कैसे कर रहा है यह प्रक्रिया?

इस पूरे मामले में AIIMS Delhi ने एक खास मेडिकल बोर्ड बनाया है, जिसमें सीनियर डॉक्टर, कानूनी एक्सपर्ट और एथिक्स कमेटी के सदस्य शामिल हैं। ये टीम पहले मरीज की हालत, दस्तावेज और परिवार की सहमति को अच्छे से जांचती है। कानून के अनुसार, यह जरूरी है कि हर कदम बहुत सावधानी और पारदर्शिता के साथ उठाया जाए। डॉक्टर यह भी सुनिश्चित करते हैं कि मरीज की हालत पूरी तरह से गंभीर और ठीक न होने वाली हो। जब सभी प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं, तब life support को धीरे-धीरे हटाया जाता है ताकि मरीज को किसी तरह की तकलीफ या दर्द महसूस न हो।

हरीश राणा का मामला

हरीश राणा 2013 में एक हादसे के बाद गंभीर ब्रेन डैमेज का शिकार हो गए थे। तब से वह कोमा में हैं और ना बोल सकते हैं, ना ही सामान्य तरीके से प्रतिक्रिया दे सकते हैं। उनके माता-पिता ने सालों तक उनकी देखभाल की, लेकिन आखिरकार उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी इस स्थिति ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या ऐसे मरीजों को सिर्फ मशीनों के सहारे जिंदा रखना सही है, जब उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है।

क्यों है यह मामला अहम?

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के हेल्थ सिस्टम के लिए एक बड़ा संकेत है। इससे लोगों में “right to die with dignity” यानी सम्मान के साथ मृत्यु के अधिकार को लेकर जागरूकता बढ़ेगी। साथ ही, यह भी समझ आता है कि पेलिएटिव केयर (आखिरी समय की देखभाल) कितनी जरूरी है, ताकि मरीज और परिवार दोनों को कम से कम मानसिक और शारीरिक दर्द झेलना पड़े।