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हरीश राणा की दर्दनाक कहानी पर फिल्म बनाने की कवायद शुरू, ‘इच्छामृत्यू’ पर पहले भी बन चुकी हैं फिल्में

Harish Rana Euthanasia Case: गाजियाबाद के हरीश राणा के इच्छामृत्यू मामले पर अब फिल्म बनाने की कवायद शुरू हो गई है। क्या है पूरा मामला, चलिए जानते हैं।

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Harish Rana Euthanasia Case

Harish Rana Euthanasia Case (सोर्स- एक्स)

Harish Rana Euthanasia Case: पिछले कुछ दिनों से देशभर में एक खबर लगातार चर्चा में है। गाजियाबाद के युवक हरीश राणा की जिंदगी से जुड़ा मामला अब केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ये फिल्म इंडस्ट्री की दिलचस्पी का विषय भी बन गया है। बताया जा रहा है कि कई फिल्म निर्माता इस दर्दनाक लेकिन भावनात्मक कहानी को बड़े पर्दे पर उतारने की योजना बना रहे हैं। हरीश राणा का मामला इच्छामृत्यु और मानवीय गरिमा के अधिकार पर नई बहस को जन्म दे रहा है।

एक हादसा जिसने जिंदगी बदल दी (Harish Rana Euthanasia Case)

करीब एक दशक पहले की यह घटना है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ में रह रहे थे। छात्र जीवन के दौरान एक दिन वो अपने पीजी की ऊंची मंजिल से गिर गए। गिरने से उनके सिर में गंभीर चोट आई और वह बेहोशी की हालत में चले गए। इस दुर्घटना के बाद उनकी स्थिति लगातार गंभीर बनी रही।

इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने काफी कोशिशें कीं, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया और वह लंबे समय तक कोमा जैसी अवस्था में जीवन बिताने लगे।

परिवार की कठिन लड़ाई (Harish Rana Euthanasia Case)

बेटे को वर्षों तक इस हालत में देखना परिवार के लिए बेहद दर्दनाक रहा। हरीश के माता-पिता ने कई सालों तक उम्मीद बनाए रखी, लेकिन जब डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि उनके ठीक होने की संभावना बहुत कम है, तब उन्होंने एक कठिन फैसला लिया। उन्होंने अदालत में याचिका दायर कर बेटे के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी।

कानूनी प्रक्रिया आसान नहीं थी। पहले यह मामला अदालत में स्वीकार नहीं किया गया था, लेकिन बाद में संवैधानिक प्रावधानों में हुई स्पष्टता के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर विचार किया। अंततः अदालत ने चिकित्सा प्रक्रिया के तहत सम्मानजनक तरीके से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दे दी।

इच्छामृत्यु और कानून

भारत में इच्छामृत्यु का मुद्दा लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट किया था कि असाध्य और लाइलाज मरीजों को कुछ परिस्थितियों में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जा सकती है। इसका मतलब यह है कि मरीज को जीवित रखने वाले कृत्रिम उपकरणों को हटाया जा सकता है, ताकि बीमारी स्वाभाविक रूप से अपना परिणाम दे सके। इस फैसले ने मानव गरिमा, जीवन के अधिकार और मृत्यु के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर एक नई बहस शुरू कर दी है।

फिल्मी दुनिया की दिलचस्पी

हरीश राणा की कहानी सामने आने के बाद फिल्म जगत में भी इसकी चर्चा होने लगी है। कई लोग इसे वास्तविक जीवन की ऐसी कहानी मान रहे हैं जो समाज को सोचने पर मजबूर करती है। कुछ निर्माताओं ने अपने लेखकों को इस विषय पर पटकथा तैयार करने की जिम्मेदारी भी दी है।

‘गुजारिश’ से समानता

दिलचस्प बात यह है कि इस मामले की तुलना अक्सर संजय लीला भंसाली की फिल्म गुजारिश से की जा रही है। उस फिल्म में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी दिखाई गई थी जो गंभीर चोट के बाद लकवाग्रस्त हो जाता है और अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगता है। आज जब हरीश राणा का वास्तविक जीवन का मामला सामने आया है, तो लोगों को फिल्म की कहानी याद आने लगी है।

सिनेमा और समाज का रिश्ता

अक्सर कहा जाता है कि सिनेमा समाज का आईना होता है। कई बार फिल्में वास्तविक घटनाओं से प्रेरित होती हैं और कई बार वास्तविक जीवन की घटनाएं फिल्मों से मिलती-जुलती लगती हैं। हरीश राणा का मामला भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है।

अगर इस विषय पर फिल्म बनती है तो यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं होगी, बल्कि यह उस संघर्ष, संवेदना और कानूनी लड़ाई की कहानी होगी जिसे एक परिवार ने वर्षों तक झेला है।