
सेप्टीसीमिया: ऑक्सीडेंट बैलेंस बिगडऩे से ब्लड में संक्रमण
कुल 100 सेप्सिस के मरीजों व 50 स्वस्थ्य पंजीकृत लोगों पर किए गए शोध में पता चला कि रक्त को संक्रमित करने वाले रोगाणुओं को खत्म करने के साथ यदि शरीर की प्रतिरक्षी चेन रिएक्शन को नियंत्रित किया जा सके तो आइसीयू में भर्ती होने के बावजूद सेप्सिस से मौत का शिकार होने वाले लाखों लोगों की जान बचा सकते हैं। परिणामों से सेप्सिस के इलाज के लिए प्रभावी दवा के निर्माण के लिए दवा निर्माताओं को भी नई दिशा मिलेगी। डॉ. मेहता व सहशोधकर्ता डॉ. अनुपम ज्योति ने साथ काम किया और शोध में पाया कि सेप्सिस के मरीजों के रक्त में कोशिकाओं की क्षति से बढऩे वाले कैमिकल लेवल से ऑक्सीडेंट स्ट्रेस बढ़ता है।
क्या है सेप्टीसीमिया
ज ब कोई बैक्टीरिया या रोगाणु फेफड़े, त्वचा, यूरिनरी सिस्टम में संक्रमण के बाद सीधे रक्तप्रवाह में मिलकर उसे संक्रमित करता है तो उसे सेप्टीसीमिया कहते हैं। रक्त द्वारा यह संक्रमण पूरे शरीर मैं फैलता है। ऐसे में प्रतिरक्षी प्रणाली प्रतिक्रिया करती है। इस दौरान कई तरह के रसायनों का निर्माण व स्राव होता है। सेप्सिस में संक्रमण के खिलाफ शरीर की प्रतिक्रिया उसके स्वयं के ऊतक व अंगों को नुकसान पहुंचाने लगती है।
ऐसे समझें चेन रिएक्शन
संक्रमण से रक्त में मौजूद कैमिकल का लेवल बढ़ता है जो दुष्प्रभाव के रूप में विभिन्न अंगों के संचालन को बाधित करता है। इसे ऑक्सीडेंट स्ट्रेस कहते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट एवं ऑक्सीडेंट्स का सामान्य संतुलन गड़बड़ा जाता है जिससे कोशिकाओं में जहर व संक्रमण फैलने और अंगों को स्थायी नुकसान या अंत में अंग काम करना बंद कर देने से मरीज की मौत हो जाती है। सेहत में सुधार के लिए इस चेन रिएक्शन को रोकना जरूरी है।
प्रमुख आंकड़े
देश में सेप्सिस के 34 प्रतिशत मरीज आईसीयू में दम तोड़ देते हैं। विश्व में हर साल 42 लाख नवजात-बच्चे इससे प्रभावित होते हैं।
एक्सपर्ट : डॉ. सुधीर मेहता, सीनियर फिजिशियन, सवाई मानसिंह अस्पताल, जयपुर
Published on:
15 Nov 2019 02:17 pm
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