
Typhoid Becomes an Economic Crisis in India(AI Image-ChatGpt)
Typhoid: मियादी बुखार यानी टाइफाइड अब भारत में सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के लिए आर्थिक तबाही का कारण बन चुकी है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों के नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि टाइफाइड से भारत को हर साल करीब 12,300 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हो रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस खर्च का 91% बोझ सीधे मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है।
अध्ययन के अनुसार, 70 हजार से अधिक परिवार 'कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ कॉस्ट' की स्थिति में पहुंच गए हैं यानी वे अपनी आय का 40% से अधिक हिस्सा सिर्फ इलाज पर खर्च कर रहे हैं। इससे उनके लिए खाना, घर और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है।
एक और बड़ी चिंता एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता है। अध्ययन में सामने आया कि टाइफाइड के कुल खर्च का 87% हिस्सा दवाओं के बेअसर होने से बढ़ रहा है। अस्पताल में भर्ती 80% से अधिक मामले ड्रग-रेसिस्टेंट टाइफाइड के हैं। इससे इलाज लंबा और महंगा होता जा रहा है।
देश के आधे से अधिक मामले महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश से आ रहे हैं। 2023 में देशभर में 49,30,326 मामले सामने आए और 7,850 लोगों की मौत हुई। दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक पर कुल मामलों का 29% बोझ रहा। सबसे अधिक खतरा 10 साल से कम उम्र के बच्चों को है। पांच से नौ साल के बच्चों में दवा-प्रतिरोधी मामले सबसे ज्यादा हैं, जबकि छह महीने से चार साल के बच्चों में मृत्यु का जोखिम सर्वाधिक है। पांच साल से कम उम्र के 3.21 लाख बच्चों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए व्यापक टीकाकरण, स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता, एंटीबायोटिक दवाओं का जिम्मेदार और सही उपयोग, मजबूत स्वास्थ्य प्रणालियां तथा बेहतर स्वास्थ्य बीमा कवरेज आवश्यक हैं, जिससे लोगों की सुरक्षा और बीमारी की रोकथाम की जा सके।
Updated on:
30 Mar 2026, 4:33 AM IST
Published on:
30 Mar 2026, 4:33 AM IST
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