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कैसी है मेल गिब्सन की ‘Force of Nature’, जानें कहां हुई चूक

हॉलीवुड के सुपर सितारे मेल गिब्सन ( Mel Gibson ) की आपदा फिल्म 'फोर्स ऑफ नेचर' ( Force of Nature ) का काफी समय से इंतजार किया जा रहा था। सिनेमाघर बंद होने के कारण हाल ही इसका सीधे डिजिटल प्रीमियर ( Digital Premiere ) किया गया। यह फिल्म देखकर झटका लगता है। यकीन नहीं होता कि इसे हॉलीवुड ( Hollywood movies ) में तैयार किया गया है।

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कैसी है मेल गिब्सन की 'Force of Nature', जानें कहां हुई चूक

कैसी है मेल गिब्सन की 'Force of Nature', जानें कहां हुई चूक

-दिनेश ठाकुर
आपदा (डिजास्टर) फिल्मों के मामले में हॉलीवुड हमेशा आगे रहा है। आग हादसे पर उसकी 'द टावरिंग इनफर्नो' (1974) क्लासिक का दर्जा रखती है। जब अमरीका में तेजी से बहुमंजिला इमारतों का जाल फैल रहा था, निर्देशक जॉन गुलिर्मिन की इस फिल्म में बड़े रोमांचक ढंग से दिखाया गया कि अगर किसी बहुमंजिला इमारत में आग लग जाए तो कैसी-कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। भारत में कई बड़े आग हादसे हो चुके हैं, लेकिन इन पर कोई फिल्म नहीं बनी। वैसे भी आपदा फिल्मों के मामले में बॉलीवुड का रेकॉर्ड कुछ खास नहीं है। 'द टावरिंग इनफर्नो' के साथ-साथ जापानी फिल्म 'द बुलेट ट्रेन' से प्रेरणा लेकर निर्देशक रवि चोपड़ा ने 'द बर्निंग ट्रेन' (1980) बनाई तो इसमें फोकस आपदा पर कम, नाच-गानों और मारधाड़ पर ज्यादा रहा। तकनीक के मामले में भी यह जापानी फिल्म के मुकाबले काफी कमजोर रही। इससे पहले रवि चोपड़ा के चाचा यश चोपड़ा ने 'काला पत्थर' (1979) नाम की आपदा फिल्म बनाई थी। चासनाला कोयला खान हादसे पर बनी इस फिल्म में यश चोपड़ा ने भी मूल विषय से भटककर ज्यादातर रीलें नाच-गानों और ढिशुम-ढिशुम में खर्च कर दीं। हॉलीवुड की 'द डे द अर्थ कॉट फायर', 'द डे आफ्टर टुमारो', 'द परफेक्ट स्टॉर्म', 'मिरेकल माइल' और 'ओनली द ब्रेव' को टक्कर देने वाली कोई फिल्म बॉलीवुड नहीं बना सका।

हॉलीवुड के सुपर सितारे मेल गिब्सन ( Mel Gibson ) की आपदा फिल्म 'फोर्स ऑफ नेचर' ( Force of Nature ) का काफी समय से इंतजार किया जा रहा था। सिनेमाघर बंद होने के कारण हाल ही इसका सीधे डिजिटल प्रीमियर ( Digital Premiere ) किया गया। यह फिल्म देखकर झटका लगता है। यकीन नहीं होता कि इसे हॉलीवुड ( Hollywood movies ) में तैयार किया गया है। तीन साल पहले प्यूर्टो रिको में आए विनाशकारी तूफान की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म शुरू से आखिर तक इतनी फुसफुसी है कि अच्छे-खासे सिरदर्द का सबब बन जाती है। कहानी इतनी-सी है कि कुछ बदमाश तूफान के दौरान बड़ी डकैती की योजना बनाते हैं। हीरो (मेल गिब्सन) और उसके साथी उनके इरादों को नाकाम करने में जुट जाते हैं। कई घटनाएं हास्यास्पद हैं। फिल्म बार-बार पटरी से उतर जाती है। मेल गिब्सन की मौजूदगी भी फिल्म की लडख़ड़ाहट को नहीं रोक पाती। उनके एक्शन में 'लीथल वेपन', 'हेमलेट', 'ब्रेवहार्ट', 'वी वर सोल्जर्स' और 'द मैन विदाउट ए फेस' जैसी कई फिल्मों में जो जोश था, जो चुस्ती-फुर्ती थी, 'फोर्स ऑफ नेचर' में गायब है। पूरी फिल्म में वे थके-थके-से नजर आते हैं। एमले हिर्श और केट बॉसवर्थ की अदाकारी भी नहीं बांध पाती।

मिशेल पॉलिश के निर्देशन में बनी यह फिल्म 91 मिनट की है। इसे देखते हुए लगता है कि यह काफी देर से खामख्वाह चली जा रही है। इसे जल्दी खत्म हो जाना चाहिए। गनीमत है कि इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उतारा गया, सिनेमाघरों में उतारा जाता तो बॉक्स ऑफिस पर इसका शहीद होना तय था।