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4200 फीट ऊंचाई पर बने अनोखे शिव मंदिर में त्रिशूल लेकर मांगी जाती है मन्नत

पचमढ़ी की वादियों में स्थित है चौरागढ़ मंदिर

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4200 फीट ऊंचाई पर बने अनोखे शिव मंदिर में त्रिशूल लेकर मांगी जाती है मन्नत

शकील नियाजी/पिपरिया। पचमढ़ी की वादियो में स्थित चौरागढ़ मंदिर। भोलेनाथ का एक ऐसा धाम जहां प्रदेश सहित आसपास से बड़ी संख्या में शिवभक्त पूजा अर्चना करने और मन्नत मांगने के लिए जाते हैं। इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है।
मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं त्रिशूल
42 सौ फीट ऊंचाई पर बना चौरागढ़ मंदिर का अनोखा इतिहास है। चौरागढ़ महंत बताते हैं कि यहां हर साल महाशिवरात्रि मेले में शिवभक्त क्विंटलों वजनी त्रिशूल कांधे पर रखकर मन्नत पूरी होने की आस लेकर पहुंचते हैं। मान्यता है कि चौरा बाबा ने वर्षों पहले पहाड़ी पर तपस्या की थी। जिसके बाद भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि बाबा के नाम से यहां भोले जाने जाएंगे। तभी से पहाड़ी की चोटी का नाम बाबा के नाम पर चौरागढ़ रखा गया। इस दौरान भोलेनाथ अपना त्रिशूल चौरागढ़ में छोड़ गए थे। भक्तों ने भोलेशंकर को एक दो इंच के त्रिशूल अर्पित कर यह परंपरा प्रारंभ की।

अब चढऩे लगे वजनी त्रिशूल
वर्तमान में क्विंटलों यहं पर वजनी त्रिशूल कांधे पर रखकर दुर्गम यात्रा तय कर भक्त चौरागढ़ मंदिर पहुंचकर भोलेशंकर को मान्यता का त्रिशूल अर्पित करते हैं। त्रिशूलों की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि मेला समिति ने त्रिशूलों का उपयोग मंदिर सीढिय़ों की रैलिंग के लिए उपयोग करना प्रारंभ कर दिया है।

साल में दो बड़े मेले
महाशिवरात्रि पर चौरागढ़ मंदिर और नागपंचमी पर नागद्वारी मेला आयोजित होता है। सोमवार को महाशिवरात्रि पर करीब 50 श्रद्धालु भोलेशंकर का पूजन अभिषेक करेंगे। रविवार रात तक करीब पचास हजार से अधिक भक्तों ने पचमढ़ी में उपस्थिति दर्ज कराई है। समुद्री तलहटी से करीब 4200 फीट की ऊंचाई पर चौरागढ़ शिव मंदिर स्थित है। पचमढ़ी से 10 किमी टैक्सी से श्रद्धालू बड़़े महादेव मंदिर पहुंच रहे है इसके बाद साढ़े तीन किमी की दुर्ग पहाड़ी रास्ते की पैदल यात्रा के बाद चौरागढ़ मंदिर तक ३२५ सीढिय़ां चढ़कर मंदिर पहुच रहे है। महाशिवरात्रि की अद्र्धरात्रि को चौरागढ मंदिर में महाराष्ट्रियन भक्त भोले शंकर का विशेष अनुष्ठाान अभिषेक पूजन अर्चन करेंगे सोमवार शाम पूजन अर्चन क्रम जारी रहेगा।

सौ साल पुराना है मेले का इतिहास
बड़े महादेव मंदिर महंत गरीबदास महाराज के अनुसार महाशिवरात्रि मेले का इतिहास सौ साल पुराना है मंदिर का इतिहास और भी प्राचीन है। किवदंती है कि माता पार्वती ने महाराष्ट्र में एक बार मैना गौंडनी का रूप धारण किया था। इस वजह से महाराष्ट्र के वाशिंदे माता को बहन और भोले शंकर को बहनोई और भगवान गणेश को भांजा मानते है। दूसरी किवदंती यह भी है कि भस्मासुर से बचने भोले शंकर ने चौरागढ़ की पहाडिय़ों में शरण ली थी।