
annadramuk
- एन.सत्यमूर्ति, वरिष्ठ टिप्पणीकार
केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार जांच एजेंसियों आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के द्वारा जिस तरह से अन्नाद्रमुक के दोनों धड़ों को निशाना बना रही है, उससे लगता है कि अन्नाद्रमुक के दोनों गुट जल्द ही एक हो सकते हैं। जेल में बंद अन्नाद्रमुक महासचिव वी.के शशिकला नटराजन और पार्टी के उप महासचिव टीटीवी दीनाकरन के परिजनों और उनके सहायकों के घरों पर अचानक डाले गए आयकर छापों के बाद राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने कोयम्बटूर में स्थानीय अधिकारियों के साथ सरकारी मुद्दों पर विचार-विमर्श किया।
इस घटनाक्रम के बाद लगता है कि तमिलनाडु में राजनीतिक संकट के समाधान का मार्ग कुछ हद तक प्रशस्त हुआ है। करीब 1800 अधिकारियों द्वारा 180 ठिकानों पर मारे गए आयकर छापों से भले ही कोई और फर्क पड़ा हो या ना पड़ा हो लेकिन प्रदेश के राजनीतिक दलों ने इसके लिए केंद्र में बैठी भाजपा और राज्य में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के ईपीएस-ओपीएस धड़े की आलोचना की है। दूसरी ओर, अन्नाद्रमुक के पार्टी कार्यकर्ता मौजूदा टीम के नेतृत्व को लेकर पूर्णत: असमंजस में हैं, खास तौर पर मुख्यमंत्री एडापड्डी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) को लेकर।
कमोबेश ऐसी ही राय उपमुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) के बारे में भी है। इस बीच पार्टी में दीनाकरन के लिए पहले की अपेक्षाकृत कुछ ‘सम्मान’ की भावना पनपी है। राज्य में दीनाकरन ऐसे पहले राजनेता हैं, जिन्होंने आयकर विभाग की कार्रवाई पर उंगली उठाई थी और इसे राजनीति से प्रेरित बताया था। राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी का ईपीएस धड़ा उपचुनाव के पहले चरण में शशिकला गुट के साथ था लेकिन अब उसका धुरवरोधी है और दीनाकरन उनके चुनावी उम्मीदवार थे। उपचुनाव के लिए हुए जोरदार प्रचार के दौरान डाले गए आयकर छापों में बरामद हुए दस्तावेजों से पता चलता है कि ईपीएस सहित पार्टी के शीर्ष दस नेता दीनाकरन के समर्थन में वोट खरीदने लिए 80 करोड़ रुपए जुटाने में लगे हुए थे।
चुनाव आयोग ने आयकर अधिकारियों द्वारा दी गई इस रिपोर्ट के आधार पर ही चुनाव स्थगन का आदेश दिया है। चुनाव आयोग शीघ्र ही पार्टी के चुनाव चिन्ह ‘दो पत्ती’ पर भी अपना फैसला सुना सकता है। इसी बीच, आरके नगर उपचुनाव के पहले या बाद में पार्टी के दोनों गुटों के बीच गठबंधन की संभावना बनती नजर आ रही है क्योंकि दोनों ही गुट को समझ में आ गया है कि केंद्र सरकार किसी ना किसी तरह उन्हें निशाना बना रही है।
दूसरी ओर, पिछले 25 सालों से अम्मा जिस प्रकार केंद्र के समक्ष अपने राज्य के कुशल नेतृत्व के बूते अटल व अडिग खड़ी रहीं, उसके मद्देनजर अब अगर अन्नाद्रमुक में कोई अंदरुनी कमजोरी उभरती है तो यह राज्य के नेतृत्व को केंद्र के समक्ष कमजोर ही साबित करने का काम करेगी। इसी मजबूरी के चलते हो सकता है कि दोनों गुट एक हो जाएं। संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि आगामी लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की ‘चुनावी भलाई’ के मद्देनजर भाजपा नेता, राज्य व केंद्र अन्नाद्रमुक के प्रति अपना रवैये में बदलाव कर उसे थोड़ा नरम कर लें। उधर, राज्यपाल पुरोहित द्वारा कोयम्बटूर में जिलाधिकारियों से विचार-विमर्श कर रहे हैं। हालांकि राज्यपाल का यह कदम पूर्णत: संवैधानिक लगता है।

Published on:
24 Nov 2017 04:49 pm
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