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Bela Mitra: आइए जानते हैं महिला सेनानी बेला मित्रा के बारे में जो नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिला के चलती थीं

Bela Mitra: नेताजी सुभाष चंद्र बोस को तो सभी जानते हैं, लेकिन आज हम बात करते हैं उन महिला के बारे में जो सदैव नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिलाके चलती थीं। और उन्होंने हर कदम पर नेताजी का साथ निभाया है।

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Bela Mitra

नई दिल्ली। Bela Mitra: नेताजी सुभाष चंद्र बोस जिनको हम सभी अच्छे से जानते हैं। देश को आजाद कराने के लिए उनका बहुत बड़ा रोल रहा है। लेकिन क्या आप नेताजी के साथ देने वाली उन महिला के बारे में भी जानते हैं जिनका आजादी के लिए बहुत बड़ा रोल रहा है। एक ऐसी महिला जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस का हर कदम में साथ दिया है। और इनकी वजह से ही रेलवे तक को अपने नियमों में फेर बदल करनी पड़ी थी।

बेला मित्रा जिनका जन्म 1920 में हुआ था। ये रिश्ते में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भतीजी लगती थीं। लोग इन्हें बेला बोस के नाम से भी पुकारते थे। छोटे से ही बेला बहुत फुर्तीली थीं। उनके पिता जी का नाम सुरेश चंद्र बोस था। बेला भी छोटे से ही अपने चाचा यानी नेता सुभाष चंद्र बोस की तरह बनना चाहती थीं। उनका सपना था कि वे भी देश के लिए कुछ करके दिखाएं। बेला छोटी सी उम्र में भी बहुत कुछ सीख गयी थी। इसलिए जब उनके चाचा यानी नेताजी को नजरबंद किया गया तो, बेला ने उनको वहां से निकालने और भगाने में सहायता की थी। बेला के बिना नेता जी का निकल पाना बहुत ही मुश्किल था। ऐसे ही धीरे-धीरे बेला देश के और समीप आती गईं। और उन्होंने छोटी सी उम्र में ही स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था।

बेला ने छोटी सी उम्र में ही अपनी सूझ-बूझ से अनेकों जिम्मेदारियां संभालीं थी। बेला ने 1940 में ही कांग्रेस विधानसभा,रामगढ़ छोड़ दी थी। इसके साथ ही बेला ने झांसी रानी ब्रिगेड की जिम्मेदारी को अपने ऊपर ले लिया था। अपनी समझदारी के साथ आगे बढ़ते हुए उनको रेडार कम्युनिकेशन का प्रभारी भी चुना गया था।

बेला खुद तो वीर सेनानी थीं, उनके पति हरिदास मिश्रा भी एक बहुत बड़े क्रांतिकारी थे। काफी समय उन्होंने जेल में बिताया। जब वे जेल से रिहा हुए तो उन्होंने राजनीति में आने का फैसला लिया और वे जाकर कांग्रेस में शामिल हो गए। और हरिदास मिश्रा ने विधानसभा उपाध्यक्ष की कमान सभालीं।

वहीं बेला ने फैसला लिया कि वे क्रांतिकारी बनेंगी और राजनीति से दूर ही रहेंगी। बेला लोगों की मदद करने के लिए सदैव आगे बढ़ती थीं। बेला ने यहां तक कि विभाजन में जिन लोगों को कष्ट पंहुचा था, उनकी लगातार सहायता की थी। और तो और बेला ने 1947 को एक रिलीफ टीम तक बना डाली थी। जिसका नाम था झांसी रानी रिलीफ टीम। बेला बहुत ही ज्यादा नरम दिल की थीं। वे किसी को कष्ट में नहीं देख सकती थीं।

बेला शरणनार्थियों की मदद करती थीं। उन्होंन अपनी अंतिम सांस तक देश के प्रति अपनी पूरी जिम्मेदारी निभाई थी। देश और लोगों के प्रति सच्ची सद्भावना को देख हावड़ा के स्टेशन को भी उन्हीं के नाम पर रख दिया गया था। आज भी जब लोग उन्हें याद करते हैं तो उनकी देश और लोगों के प्रति दरियादिली को नहीं भूल पाते हैं।

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