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बारूद के बजाय बांस से बनते थे पटाखे, ये जान कर हो जाएंगे हैरान

बाद में पोटेशिम नाइट्रेट, सल्फर और चारकोल को मिलाते समय दुर्घटनावश बारूद की खोज हुई तो इस आयोजन की शक्ल बदल गई। अब बारूद के मिश्रम को बांस में भरकर आग में फेंका जाने लगा।
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Sunil Sharma

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Nov 13, 2020

सदियों से न केवल हमारे देश में बल्कि विश्व के लगभग सभी देशों में उत्सव, खुशी के अवसर पर आतिशबाजी अर्थात् पटाखे चलाने की परंपरा रही है। पटाखों से उत्पन्न कर्णभेदी ध्वनि जहां मनुष्य को एक भयमिश्रित प्रसन्नता प्रदान करती है वहीं आग का सितारों के रूप में नाचना, ऊपर से नीचे गिरना मनुष्य को नयनाभिराम लगता है। आतिशबाजी उर्दू का शब्द है। इसमें आतिश का अर्थ है आग और बाजी का अर्थ है खेल। यानि आतिशबाजी का अर्थ हुआ आग का खेल।

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जहां अन्य प्राणियों के लिए आग भय की वस्तु है वहीं मनुष्य ने आग को भी खेल की वस्तु बना लिया है। यह केवल मनुष्य के विलक्षण मस्तिष्क का ही कमाल है। अब बात करते हैं, शुरूआती दौर में पटाखे कैसे बनते थे। दरअसल चीन में जलावन के तौर पर हरा बांस इस्तेमाल करने की परंपरा थी। इस बांस की गांठ फटाक की तेज आवाज के साथ फटती थी। ऐसा माना जाता था कि इस आवाज से बुरी आत्माएं दूर भागती है। बाद में सार्वजनिक तौर पर हरे बांस को जलाने का आयोजन किया जाने लगा। बुरी आत्मा का नाम नियान रखा गया और इस आयोजन को 'पाआचक्र' नाम दिया गया।

बारूद की खोज से बदल गई आतिशबाजी
बाद में पोटेशिम नाइट्रेट, सल्फर और चारकोल को मिलाते समय दुर्घटनावश बारूद की खोज हुई तो इस आयोजन की शक्ल बदल गई। अब बारूद के मिश्रम को बांस में भरकर आग में फेंका जाने लगा। इससे धमाके में तेजी आई और आकर्षक चिंगारी भी देखने को मिली। चीन में करीब पांचवी सदी से इन पटाखों को छोड़ना हर धार्मिक उत्सव का अनिवार्य अंग हो गया। चीन से बाहर बारूद और पटाखे ले जाने का श्रेय खोजी यात्रियों को खासकर मार्कोपोलो को है।

चीन में खोज हुई, बाद में आतिशबाजी यूरोप पहुंची
वहां से पटाखा पहले मध्यपूर्व पहुंचा और बाद में यूरोप। ब्रिटिश स्कॉलर रॉजर बेकन ने पटाखे निर्माण में प्रयोग किए जाने वाले बारूद में काफी सुधार किए। वर्ष 1550 में बारूद में 75 प्रतिशत पोटेशियम नाइट्रेट, 10 प्रतिशत गंधक और 15 प्रतिशत चारकोल मिलाया जाने लगा जो आज तक प्रचलित है। अमरीका में आतिशबाजी सत्रहवीं सदी में शुरू हुई। ब्रिटेन में वर्ष 1730 में आतिशबाजी का सार्वजनिक आयोजन किया गया। शुरूआत के पटाखे और आतिशबाजी में सिर्फ नारंगी व सफेद चिंगारी निकलती थी। उन्नीसवीं सदी में रंगीन आतिशबाजी शुरू हो गई और अलग-अलग कलर्स के लिए अलग-अलग केमिकल्स मिलाए जाने लगे।