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International Nurses Day: फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने जगाई दुनिया में उम्मीदों की किरण, नर्सिंग के क्षेत्र में रहा अतुलनीय योगदान

विश्व की महान नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्मदिन 12 मई को होता है इसी दिन को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाया जाता है

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नई दिल्ली। आज जब कोरोना की महामरी से दुनियाभर में हा-हाकर मचा है, लोग वायरस के डर से अपने करीबी बीमार को छूने से कतराते हैं, ऐसे में अपनी और अपने परिवार की परवाह किये बिना मरीज की निःस्वार्थ सेवा करने वाली सफेद ड्रेस में धरती के फरिश्ते यानी नर्स जिन्हें हम सम्मान से सिस्टर कहते हैं। कभी किसी ने ये सोचा है कि आखिर उनके पेशे की शुरुआत कैसे हुई ? आज इंटरनैशनल नर्स डे पर पत्रिका की ओर से दुनियाभर के इन फ़रिश्तों को पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। ये बात अभी से लगभग 200 साल पुरानी है, आज ही के दिन 12 मई सन 1820 में इटली के फ्लोरेंस में विलियम नाइटिंगेल और फेनी नाइटिंगेल के यहां एक सुंदर सी बच्ची ने जन्म लिया जिसका नाम फ्लोरेंस नाइटिंगेल रखा गया, फ्लोरेंस नाइटिंगेल की शिक्षा दीक्षा इंग्लैंड में हुई। सम्पन्न परिवार में जन्मी फ्लोरेंस का परिवार उन्हें काबिल बना कर आलीशान ज़िंदगी जीने की प्रेरणा दे रहा था, लेकिन फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने 16 साल की अवस्था से ही अपना मंसूबा जाहिर कर दिया था। मैथ, साइंस, हिस्ट्री की पढ़ाई के अलावा वो लोगों की सेवा के लिए नर्स बनना चाहती थीं। मानव सेवा की भावना उनके हृदय में हिलकोरे मार रहा था।

जबकि फ्लोरेंस नाइटिंगेल के अमीर पिता विलियम फ्लोरेंस इस पेशे को कतई पसंद नहीं करते थे। नर्सिंग के पेशे को उस दौर में इंग्लैंड में सम्मान की नज़र से नहीं देखा जाता था। उस दौर में अस्पतालों की दुर्दशा आम बात थी। ऐसे में फ्लोरेंस नर्सिंग के लिए अपने पिता को मनाने में सफल हुईं। तब जा कर सन 1851 में फ्लोरेंस ने नर्सिंग की पढ़ाई शुरू की। उस जमाने में लंदन जैसे शहर में महिलाओं के लिए कोई अलग से अस्पताल नहीं था जिसको देखते हुए सन 1853 में फ्लोरेंस ने लंदन में महिलाओं का अस्पताल शुरू किया।

इस बीच सन 1854 में इंग्लैंड का क्रीमिया में युद्ध हुआ, ब्रितानी सैनिकों को रूस के दक्षिण में स्थित क्रीमिया में युद्ध के लिए भेजा गया। यहां ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की का रूस से भीषण युद्ध हुआ। इस लड़ाई में इंग्लैंड के बहुत से सैनिक घायल हुए और बड़ी संख्या में सैनिकों के घायल होने की जानकारी मिली, जिससे आहत हो कर, फ्लोरेंस अपने साथी नर्सों को लेकर युद्ध ग्रस्त क्रीमिया पहुँच गईं वहां के हालात बेहद खराब थे, गंदगी और घायलों के लिए उपचार की कमी से बुरा हाल था, यहां तक कि घायलों के लिए साफ पानी और बिस्तर तक नहीं थे।इतने बुरे हालात में घायलों की तेजी से मौत होने लगी। फ्लोरेंस ने खान-पीना भूल कर अस्पतालों की दशा सुधारने और घायलों के स्नान, साफ भोजन और समय पर घावों की ड्रेसिंग के काम को प्राथमिकता के आधार पर करना शुरू किया। इस सेवा से सैनिकों की हालत में जादुई बदलाव हुआ।

लैंप बनी थी पहचान

फ्लोरेंस नाइटिंगेल घायलों की सेवा में इतनी व्यस्त हुईं कि रात-रात सो रहे सैनिकों के पास जाकर उनकी देखभाल करतीं ज़रूरत पड़ने पर सैनिकों के घरवालों को चिट्ठियां लिखकर सूचना भेजती थीं। उनकी सेवा भावना की सभी दिल से आदर करते थे, और 1856 में युद्ध समाप्ति के बाद वो वतन लौटीं तब उनका नाम "लेडी विथ लैंप" पड़ गया था। एक साधारण नर्स नायिका बन कर उभरीं। फ्लोरेंस के असाधारण कार्य के लिए उनको महारानी विक्टोरिया ने धन्यवाद दिया, इतना ही नहीं सितंबर 1856 में रानी विक्टोरिया ने फ्लोरेंस से मुलाकात की और फ्लोरेंस के सुझाव पर ही सैन्य चिकित्सा प्रणाली में बड़े पैमाने पर सुधार किया गया।
लंदन के सेंट थॉमस हॉस्पिटल के कैम्पस में ही सन 1860 में नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल फॉर नर्सेज खोला गया, यहां नर्सों को प्रशिक्षण दिया जाता था। फ्लोरेंस की सेवा भावना ने लोगों के विचार बदल दिए, बाद में महिलाओं के लिए नर्सिंग को सम्मानजनक कार्य माना जाने लगा। 13 अगस्त, 1919 को फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने दुनिया को अलविदा कहा। उनके निधन के बाद सम्मान में उनके जन्मदिन को वर्ल्ड नर्सिंग डे के रूप में मनाया जाने लगा।